ॐमैं वैसे तो समाचार तंत्र से ख़ुद को दूर ही रखता हूँ किंतु कभी-कभी कुछ ऐसा हो जाता है कि जानकारी के लिये उस अर्थ के अनर्थ करने वाले तंत्र का सामना करना ही पड़ता है। मेरी इस मानसिकता का कारण यह है कि आज का समाचार तंत्र लोगों की बुद्धि भ्रष्ट करने में लगा रहता है और मेरा मस्तिष्क कोई क़िला तो है नहीं। इस लिये सबसे अच्छा यही समझता हूँ कि दूर ही रहूं। किंतु जब मैं लोगों के वाद-विवाद के तरीके देखता हूँ तो शर्म आ जाती है कि मैं भी इसी समाज का हिस्सा हूँ। आज इंटरनेट पर गालियाँ लिखने में तो कोई कंजूसी ही नहीं करता है और फिर हमारे राज नेताओं के भाषण भी तो द्वेष, क्रूरता और प्रतिकार के शब्दों से सने होते हैं। आज के राज तंत्री और व्यापारी मुद्दों ने लोगों को बौखला दिया है और अध्यात्म तथा धर्म के आनंद की कमी के कारण लोगों की सोच दूषित हो गयी है। हम आज दूसरों को लांछित करने में सुख का अनुभव करते हैं। विशेष रूप से जब कोई प्रख्यात व्यक्ति पतित होता है तो हम समाज में अफ़वाह और मिथ्या का प्रसार करते हैं और नकारात्मक विवादों में अपने आप को व्यस्त पाते हैं। तत्पश्चात हम लोगों को निराधार संज्ञा देना प्रारम्भ कर देते हैं और हर किसी को शंका और अविश्वास की दृष्टि से देखने लगते हैं। समाज की इस प्रकृति से मुझे एक कहानी ‘हार की जीत’ याद आती है। यह प्रचलित कथा है और मुझे विश्वास है कि अधिकतर लोगों ने पढ़ी होगी किंतु सार में मैं इसको दोहराता हूँ।

हार की जीत

एक छोटे से गाँव में बाबा भारती नाम के एक संत रहते थे। उनके पास एक अति आकर्षक घोड़ा था जिसकी सुंदरता पास के सारे गाँवों में विख्यात थी। उस घोड़े की ख्याति एक प्रख्यात डाकू खड़ग सिंह के कानों में भी पड़ी, तब उसने उसे चुराने का निर्णय किया। एक दिन जब बाबा भारती अपने घोड़े पर सवार सैर के लिये निकले तब खड़ग सिंह एक दीन का वेष धर रास्ते पर बैठा था। जब बाबा ने उस भिखारी की दीनता देखी तब वे उसे दान देने हेतु घोड़े से उतरे।

किंतु जैसे ही वे उस बहुरूपिये को दान देने के लिये झुके कि उसने ने बाबा की छाती पर छुरा लगा दिया। बाबा ने तुरंत ही उस डाकू को पहचान लिया। खड़ग सिंह ने तब बाबा को अपना घोड़ा देने को कहा। बाबा ने वैसा ही किया परंतु उन्होंने खड़ग सिंह से एक आग्रह किया। उन्होंने कहा कि वह घोड़ा तो ले जाये किंतु किसी अन्य को ये बात न बताये। खड़ग सिंह ऐसा करने को तैयार तो हो गया किंतु बाबा की इस बात को समझ न पाया और पूछा कि इसमें भला बाबा का क्या भला है। तब बाबा भारती ने उससे कहा कि यदि यह बात लोगों तक पहुँच गयी तो भविष्य में फिर कभी कोई किसी दीन की सहायता नहीं करेगा।

अंततः खड़ग सिंह घोड़ा तो ले गया किंतु वह बाबा की बात सुन चैन न पा सका और अगली रात ही उसने वह घोड़ा वापस कर दिया।

अस्तव्यस्त समाज

यह तो अत्यंत पीड़ा की बात है कि आज संत ही डाकू हो गये हैं, किंतु यह विचारणीय है कि ऐसे तथ्यों से उदासीनता अथवा विश्वासघात का अनुभव करना प्रतिशोध से भिन्न है। आज का समाचार तंत्र नकारात्मकता पर ही जीवित है। परिणाम स्वरूप आज हमने मान लिया है कि हम सभी भ्रष्ट हैं और संसार अब पश्चाताप के परे हो चुका है। यह आज के पाखण्डी संतों, राज तंत्री घोटालों, आतंकवाद और भ्रष्ट उद्योगपतियों की चर्चा से स्पष्ट हो जाता है। समाज ने आज अपना विश्वास और एकत्व भुला दिया है। हम अपने ही नेताओं या समाज के माननीय पदों के लांछित होने की राह देखते हैं और ऐसा होने पर “मैंने कहा था न!” जैसे वाक्यों में ही अपनी विजय मानते हैं। यह तो लज्जित होने योग्य बात है। मैं यह कतई भी नहीं कहता कि हमें इन सब बातों पर आँखें मूंद लेनी चाहिये, क्योंकि हमें जानकारी और न्याय, दोनों ही का सम्पूर्ण अधिकार है। किंतु इन बातों को ही जीवन का मुख्य आधार बना कर कटाक्ष करना और हँसी करना तो हमारा उपलक्ष नहीं हो सकता। यह तो कतैव ही सभ्यता के लिये स्वास्थ्यकारी नहीं है।

एक तरफ़ तो बाबा भारती दीन-दुखियों के प्रति विश्वास के लोप के प्रति चिंतित थे और यहाँ हम अपने नेताओं ही को लांछित करने पर अड़े हैं। जो कोई सामान्य व्यक्ति किसी तंत्र पर सवाल उठाता हो, यह उसका दायित्व बनता है कि वह अपना सर्वस्व न्योछावर कर के उसे सुधारने का भी प्रयत्न करे। अथवा मूक हो देखता रहे, किंतु समाज में नकारात्मकता तो न फैलाए। अन्यथा परिणाम विध्वंसकारी ही सिद्ध होगा। हमें यह रहस्य समझना होगा कि सभ्यता और संस्कृति, समाज में सामंजस्य और समभाव से ही फलती-फूलती है। हम यदि प्रगति और निधि की आकांक्षा रखते हैं तो हमारे लिये यह आवश्यक है कि हम मनोवैज्ञानिक धरातल पर विश्वास को स्थापित करें। किसी एक लांछित घटना को आधार बना कर पूरे समाज में हर घटना को शंकित कर देने से संस्कृति का विकास नहीं हो सकता।

सारांश

यदि हम अपने चीर दृष्टि का प्रयोग करें तो यह साधारण सी बात हमारे समझ में आ जायेगी कि हमारी नई पीढ़ियों ने शंका ही को अपना मूल भाव बना लिया है। और दीर्घा शंका अविश्वास को जन्म देती है। अविश्वास अधीरता, असहिष्णुता और व्यग्रता को जन्म देता है। असहिष्णुता और व्यग्रता से उचित निर्णय करने की शक्ति का नाश होता है। उचित निर्णय न कर पाने पर जीवन में दिशाहीनता आती है और विकास के विपरीत कोलाहल हाथ लगता है।

यही कारण है कि विश्वासघात से प्रतिशोध की भावना आने पर हमें फूँक-फूँक कर कदम रखना चाहिये। हमें अपने कर्मों के प्रतिघाती परिणाम का विचार करना चाहिये कि कहीं कबीर की बात सत्य तो नहीं हो रही कि “नदी किनारे धुआं उठे मैं जानूँ कुछ होये, जिस कारण जोगन बनी कहीं वही न जलता होये”। सत्य तो यही है कि जिस दिन हम बुराई पर शोक करने के विपरीत क्रोधित होंगे उस दिन हम और कुछ नहीं बल्कि बाहर बैठी बुराइयों को अपने हृदय में स्थान दे देंगे।


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