ॐसच्चिदानंद स्वरूप भगवान्‌ श्रीकृष्ण को हम नमस्कार करते हैं, जो जगत्‌ की उत्पत्ति, स्थिति और विनाश के हेतु तथा आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक – तीनों प्रकार के तापों का नाश करने वाले हैं। वे कई अवतारों का रूप ले कर संसार का उधार करते हैं।

एक बार भग्वतकथारूप का रसास्वादन करने में कुशल मुनिवर शौनकजी ने नैमिषारण्य क्षेत्र में विराजमान महामति सूतजी को नमस्कार करके उनसे उस कथा के बारे में पूछा जो कलियुग में पापों का नाश करने वाली है। सूतजी ने तब शौनकजी को श्री मद भगवत पुराण के चमत्कार तथा उसके साप्ताहिक विधि का विवरण सुनाया। सूतजी एवं शौनकजी के इस संवाद से हमारे समक्ष एक अनमोल रत्न प्रकट होता है। सूतजी सब पापों का नाश करने वाले सच्चिदानंद स्वरूप भगवान्‌ श्री विष्णु के अवतारों की व्याख्या करते हैं:

श्री सूतजी कहते हैं

सृष्टि के आदि में भगवान ने लोकों के निर्माण की इच्छा की। इच्छा होते ही उन्होंने महत्तत्व आदि से निष्पन्न पुरुष रूप ग्रहण किया। उसमें दस इन्द्रियाँ, एक मन और पाँच भूत – ये सोलह कलाएं थीं। उन्होंने कारण जल में शयन करते हुए जब योग निद्रा का विस्तार किया, तब उनके नाभि-सरोवर में से एक कमल प्रकट हुआ और उस कमल से प्रजापतियों के अधिपति ब्रह्माजी उत्पन्न हुए। भगवान के उस विराट रूप के अंग-प्रत्यंग में ही समस्त लोकों की कलपना की गयी है, वह भगवान का विशुद्ध सत्वमय श्रेष्ठ रूप है। योगी लोग दिव्य द्रिष्टि से भगवान के उस स्वरूप का दर्शन करते हैं। भगवान का वह रूप हज़ारों पैर, जांघों, भुजाओं, और मुखों के कारण अत्यंत विलक्षण है; उसमें सहस्रों सिर, हज़ारों कान, हज़ारों आँखें और हज़ारों नासिकाएं हैं। हज़ारों मुकुट, वस्त्र और कुण्डल आदि आभूषणों से वह उल्लासित रहता है। भगवान का यही पुरुष रूप, जिसे नारायण कहते हैं, अनेक अवतारों का अक्षय कोष है – इसी से सारे अवतार प्रकट होते हैं। इस रूप के छोटे से छोटे अंश से देवता, पशु-पक्षी और मनुष्य आदि योनिओं की सृष्टि होती है।

  • उन्हीं प्रभु ने पहले कौमारसर्ग में सनक, सनंदन, सनातन और सनत्कुमार – इन चार ब्राह्मणों के रूप में अवतार ग्रहण कर के अत्यंत कठिन अखण्ड ब्रह्मचर्य का पालन किया।
  • दूसरी बार इस संसार के कल्याण के लिए समस्त यज्ञों के स्वामी उन भगवान्‌ ने ही रसातल में गयी हुई पृथ्वी को निकाल लाने के विचार से सूकर रूप ग्रहण किया।
  • ऋषियों की सृष्टि में उन्होंने देवर्षि नारद के रूप में तीसरा अवतार ग्रहण किया और सात्वत तंत्र (जिसे ‘नारद-पाँन्चरात्र’ कहते हैं) उपदेश किया; उसमें कर्मों के द्वारा किस प्रकार कर्म बंधन से मुक्ति मिलती है, इसका वर्णन है।
  • धर्मपत्नी मूर्ति के गर्भ से उन्होंने ‘नर-नारायण’ के रूप में चौथा अवतार ग्रहण किया। इस अवतार में उन्होंने ऋषि बनकर मन और इंद्रियों का सर्वथा संयम करके बड़ी कठिन तपस्या की।
  • पाँचवें अवतार में वे सिद्धों के स्वामी कपिल के रूप में प्रकट हुए और तत्वों का निर्णय करने वाले ‘सांख्य-शास्त्र’ का, जो समय के फेर से लुप्त हो गया था, आसुरी नामक ब्राह्मण को उपदेश दिया।
  • अनसूया के वर मांगने पर छठे अवतार में वे अत्रि की संतान – दत्तात्रेय हुए। इस अवतार में उन्होंने अलर्क एवं प्रह्लाद आदि को ब्रह्मज्ञान का उपदेश किया।
  • सातवीं बार रुचि प्रजापति कि आकूति नामक पत्नी से यज्ञ के रूप में उन्होंने अवतार ग्रहण किया और अपने पुत्र याम आदि देवताओं के साथ स्वायम्भुव मन्वंतर की रक्षा की।
  • राजा नाभि की पत्नी मेरु देवी के गर्भ से ऋषभ देव के रूप में आठवाँ अवतार ग्रहण किया। इस रूप में उन्होंने परम हंसों का वह मार्ग, जो सभी आश्रमियों के लिये वंदनीय है, दिखाया।
  • ऋषियों की प्रार्थना से नवीं बार वे राजा पृथु के रूप में अवतीर्ण हुए। शौनकादि ऋषियों! इस अवतार में उन्होंने पृथ्वी से समस्त औषधियों का दोहन किया था, इससे यह अवतार सब के लिये बड़ा ही कल्याणकारी हुआ।
  • चाक्षुष मन्वंतर के अंत में जब सारी त्रिलोकी समुद्र में डूब रही थी, तब उन्होंने मत्स्य के रूप में दसवाँ अवतार ग्रहण किया और पृथ्वीरूपी नौका पर बैठा कर अगले मन्वंतर के अधिपति वैवस्वत मनु की रक्षा की।
  • जिस समय देवता और दैत्य समुद्र मंथन कर रहे थे, उस समय ग्यारहवाँ अवतार धारण कर के कच्छप रूप से भगवान्‌ ने मन्दराचल को अपनी पीठ पर धारण किया।
  • बारहवीं बार धन्वंतरि के रूप में अमृत ले कर समुद्र से प्रकट हुए।
  • तेरहवीं बार मोहिनी रूप धारण कर के दैत्यों को मोहित करते हुए देवताओं को अमृत पिलाया।
  • चौदहवें अवतार में उन्होंने नरसिंह रूप धारण किया और अत्यंत बलवान्‌ दैत्य राज हिरण्यकशिपु की छाती अपने नखों से अनायास इस प्रकार फाड़ डाली, जैसे चटाई बनाने वाला सींक को चीर डालता है।
  • पंद्रहवीं बार वामन का रूप धारण कर के भगवान्‌ दैत्य राज बली के यज्ञ में गए। वे चाहते तो थे त्रिलोकी का राज्य, परंतु मांगी उन्होंने केवल तीन पग पृथ्वी।
  • सोलहवें परशुराम अवतार में जब उन्होंने देखा कि राजा लोग ब्राह्मणों के द्रोही हो गये हैं, तब क्रोधित हो कर उन्होंने पृथ्वी को इक्कीस बार क्षत्रियों से शून्य कर दिया।
  • इसके बाद सत्रहवें अवतार में सत्यवती के गर्भ से पराशरजी के द्वारा वे व्यास के रूप में अवतीर्ण हुए। उस समय लोगों की समझ धारणा शक्ति कम देख कर आपने वेद रूप वृक्ष की कई शाखाएं बना दीं।
  • अठारहवीं बार देवताओं का कार्य सम्पन्न करने की इच्छा से उन्होंने राजा के रूप में रामावतार ग्रहण किया और सेतु-बंधन, रावण वध आदि वीरतापूर्ण बहुत सी लीलाएं कीं।
  • उन्नीसवें और बीसवें अवतारों में उन्होंने यदु वंश में उन्होंने बलराम और श्री कृष्ण के नाम से प्रकट हो कर पृथ्वी का भार उतारा।
  • इसके बाद कलियुग आ जाने पर मगध देश में देवताओं के द्वेषी दैत्यों को मोहित करने के लिए अजन के पुत्र रूप में आपका बुद्धावतार होगा।
  • इससे भी बहुत पीछे जब कलियुग का अंत समीप होगा और राजा लोग प्रायः लुटेरे हो जाएंगे, तब जगत्‌ के रक्षक भगवान्‌ विष्णु यश नामक ब्राह्मण के घर कल्कि रूप में अवतीर्ण होंगे।

शौनकादि ऋषियों! जैसे अगाध सरोवर से हजारों छोटे-छोटे नाले निकलते हैं, वैसे ही सत्वनिधि भगवान्‌ श्री हरि के असंख्य अवतार हुआ करते हैं। ऋषि, मनु, देवता, प्रजापति, मनु पुत्र और जितने भी महान्‌ शक्तिशाली हैं, वे सब के सब भगवान्‌ के ही अंश हैं।

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