शिव पुराण के कोटि-रुद्र-संहिता के अड़तीसवें अध्याय में सूत जी, भगवान शिव के द्वारा विष्णु को बतायी हुई शिवरात्रि व्रत विधि एवं महिमा का वर्णन करते हैं।

ऋषियों ने पूछा – व्यास शिष्य! किस व्रत से संतुष्ट हो कर भगवान शिव उत्तम सुख प्रदान करते हैं? जिस व्रत के अनुष्ठान से भक्त जनों को भोग और मोक्ष की प्राप्ति हो सके, उसका आप विशेष रूप से वर्णन कीजिये।

सूत जी ने कहा – महर्षियों तुमने जो कुछ पूछा है, वही बात किसी समय ब्रह्मा, विष्णु तथा पार्वती जी ने भगवान शिव से पूछी थी। इसके उत्तर में जो कुछ शिव जी ने कहा, वह मैं तुम लोगों को बता रहा हूँ।

भगवान शिव बोले – मेरे बहुत से व्रत हैं, जो भोग और मोक्ष प्रदान करने वाले हैं। उनमें मुख्य दस व्रत हैं, जिन्हें जाबालक्षुति के विद्वान ‘दश शर्व व्रत’ कहते हैं। मुक्ति मार्ग में प्रवीण पुरुषों को मोक्ष की प्राप्ति कराने वाले चार व्रतों का नियम पूर्वक पालन करना चाहिये। वे चार व्रत इस प्रकार हैं – भगवान शिव की पूजा, रुद्र मंत्रों का जप, शिव मंदिर में उपवास तथा काशी में मरण।

हरे! इन चारों में भी शिवरात्रि व्रत ही सबसे अधिक बलवान है। इस लिये भोग और मोक्ष रूपी फल की इच्छा रखने वाले लोगों को मुख्यतः उसी का पालन करना चाहिये। इस व्रत को छोड़ कर दूसरा कोई मनुष्यों के लिये हित कारक व्रत नहीं है। यह व्रत सब के लिये धर्म का उत्तम साधन है। निष्काम अथवा सकाम भाव रखने वाले सभी मनुष्यों, वर्णों, आश्रमों, स्त्रियों, बालकों, दासों, दासियों तथा देवता आदि सभी देहधारियों के लिये यह श्रेष्ठ व्रत हित कारक बताया गया है।

माघ मास के कृष्ण पक्ष में शिवरात्रि तिथि का विशेष महात्म्य बतलाया गया है। जिस दिन आधी रात के समय तक वह तिथि विद्यमान हो, उसी दिन उसे शिवरात्रि व्रत के लिये ग्रहण करना चाहिये। शिवरात्रि करोड़ों हत्याओं के पाप का नाश करने वाली है। केशव! उस दिन सबेरे से ले कर जो कार्य करना आवश्यक है, उसे प्रसन्नतापूर्वक तुम्हें बता रहा हूँ; तुम ध्यान दे कर सुनो। बुद्धिमान पुरुष सबेरे उठ कर बड़े आनंद के साथ स्नान आदि नित्य कर्म करे। आलस्य को पास न आने दे। फिर शिवालय में जा कर शिवलिंग का विधिवत पूजन कर के मुझ शिव को नमस्कार करने के पश्चात उत्तम रीति से संकल्प करे –

शिवरात्रि व्रत का संकल्प

देवदेव महादेव नीलकण्ठ नमोऽस्तु ते ।
कर्तुमिच्छाम्यहं देव शिवरात्रिव्रतं तव ॥
तव प्रभावाद्देवेश निर्विघ्नेन भवेदिति ।
कामाद्याः शत्रवो मां वै पीडां कुर्वन्तु नैव हि ॥

देवदेव! महादेव! नीलकण्ठ! आपको नमस्कार है। देव! मैं आपके शिवरात्रि व्रत का अनुष्ठान करना चाहता हूँ। देवेश्वर! आपके प्रभाव से यह व्रत बिना किसी विघ्न-बाधा के पूर्ण हो और काम आदि शत्रु मुझे पीड़ा न दें।

ऐसा संकल्प करके पूजन सामग्री का संग्रह करे और उत्तम स्थान में शास्त्र प्रसिद्ध शिवलिंग हो, उसके पास रात में जा कर स्वयं उत्तम विधि-विधान का संपादन करे; फिर शिव के दक्षिण या पश्चिम भाग में सुंदर स्थान पर उनके निकट ही पूजा के लिये संचित सामग्री को रखे। तदनंतर श्रेष्ठ पुरुष वहाँ फिर स्नान करे। स्नान के बाद सुंदर वस्त्र और उपवस्त्र धारण कर के तीन बार प्रदक्षिणा करने के पश्चात पूजन आरम्भ करे। जिस मंत्र के लिये जो द्रव्य नियत हो, उस मंत्र को पढ़ कर उसी द्रव्य के द्वारा पूजा करनी चाहिये। बिना मंत्र के महादेव जी की पूजा नहीं करनी चाहिये। गीत, वाद्य, नृत्य आदि के साथ भक्ति भाव से सम्पन्न हो रात्रि के प्रथम पहर में पूजन करके विद्वान पुरुष मंत्र का जप करे। यदि मंत्रज्ञ पुरुष उस समय श्रेष्ठ पार्थिव लिंग का निर्माण करे तो नित्य कर्म करने के पश्चात पार्थिव लिंग का ही पूजन करे। पहले पार्थिव लिंग बनाकर पीछे उसकी विधिवत स्थापना करे। फिर पूजन के पश्चात नाना प्रकार के स्तोत्रों द्वारा भगवान वृषभ ध्वज को संतुष्ट करें। बुद्धिमान पुरुष को चाहिये कि उस समय शिवरात्रि व्रत के महात्म्य का पाठ करे। श्रेष्ठ भक्त अपने व्रत की पूर्ति के लिये उस महात्म्य को श्रद्धा पूर्वक सुने। रात्रि के चारों प्रहरों में चार पार्थिव लिंगों का निर्माण करके आवाहन से ले कर विसर्जन तक क्रमशः उनकी पूजा करे और बड़े उत्सव के साथ प्रसन्नता पूर्वक जागरण करे। प्रातः काल स्नान कर के पुनः वहाँ पार्थिव शिव का स्थापन और पूजन करे। इस तरह व्रत को पूरा करके हाथ जोड़ मस्तक झुका कर बारंबार नमस्कार पूर्वक भगवान शम्भु से इस प्रकार प्रार्थना करे –

प्रार्थना एवं विसर्जन

नियमो यो महादेव कृतश्चैव त्वदाज्ञया ।
विसृज्यते मया स्वामिन्व्रतं जातमनुत्तमम् ॥
व्रतेनानेन देवेश यथाशक्तिकृतेन च ।
सन्तुष्टो भव शर्वाद्य कृपां कुरु ममोपरि ॥

महादेव! आपकी आज्ञा से मैंने जो शिवरात्रि व्रत ग्रहण किया था, स्वामिन्‌! वह परम उत्तम व्रत पूर्ण हो गया। अतः अब उसका विसर्जन करता हूँ। देवेश्वर शर्व! यथाशक्ति किये गये इस व्रत से आप आज मुझ पर कृपा कर के संतुष्ट हों।

तत्पश्चात शिव को पुष्पांजलि समर्पित कर के विधिपूर्वक दान दें। फिर शिव को नमस्कार करके व्रत संबंधी नियम का विसर्जन कर दें। अपनी शक्ति के अनुसार शिव भक्त ब्राह्मणों, विशेषतः सन्यासियों को भोजन करा कर पूर्णतया संतुष्ट कर के स्वयं भी भोजन करें।

हरे! शिवरात्रि को प्रत्येक प्रहर में श्रेष्ठ शिव भक्तों को जिस प्रकार विशेष पूजा करनी चाहिये, उसे मैं बताता हूँ; सुनो।

प्रथम प्रहर

प्रथम प्रहर में पार्थिव लिंग की स्थापना करके अनेक सुंदर उपचारों द्वारा उत्तम भक्ति भाव से पूजा करें। पहले गन्ध, पुष्प आदि पाँच द्रव्यों द्वारा सदा महादेव जी की पूजा करनी चाहिये। उस-उस द्रव्य से संबंध रखने वाले मंत्र का उच्चारण कर के पृथक-पृथक वह द्रव्य समर्पित करें। इस प्रकार द्रव्य समर्पण के पश्चात भगवान शिव को जल धारा अर्पित करें। विद्वान पुरुष चढ़े हुए द्रव्यों को जल धारा से ही उतारे। जल धारा के साथ-साथ एक सो आठ मंत्र का जप कर के वहाँ निर्गुण-सगुण रूप शिव का पूजन करे। गुरु से प्राप्त हुए मंत्र द्वारा भगवान शिव की पूजा करे। अन्यथा नाम मंत्र द्वारा सदाशिव का पूजन करना चाहिये। विचित्र चंदन, अखण्ड चावल और काले तिलों से परमात्मा शिव की पूजा करनी चाहिये। कमल और कनेर के फूल चढ़ाने चाहिये। आठ नाम-मंत्रों द्वारा शंकर जी को पुष्प समर्पित करे। वे आठ नाम इस प्रकार हैं – भव, शर्व, रुद्र, पशुपति, उग्र, महान, भीम और ईशान। इनके आरम्भ में ‘श्री’, अंत में चतुर्थी विभक्ति ‘श्री भवाय नमः’ इत्यादि नाम मंत्रों द्वारा शिव का पूजन करे। पुष्प समर्पण के पश्चात धूप, दीप और नैवेद्य निवेदन करे। पहले प्रहर में विद्वान पुरुष नैवेद्य के लिये पकवान बनवा ले। फिर श्री फल युक्त विशेषार्ध्य देकर ताम्बूल समर्पित करे। तदनंतर नमस्कार और ध्यान कर के गुरु के दिये हुए मंत्र का जप करे। गुरुदत्त मंत्र न हो तो पंचाक्षर मंत्र के जप से भगवान शंकर को संतुष्ट करे, धेनु मुद्रा दिखा कर उत्तम जल से तर्पण करे। पश्चात अपनी शक्ति के अनुसार पाँच ब्राह्मणों को भोजन कराने का संकल्प करे। फिर जब तक पहला प्रहर पूरा न हो जाए, तब तक महान उत्सव करता रहे।

द्वितीय प्रहर

दूसरा प्रहर आरम्भ होने पर पुनः पूजन के लिये संकल्प करे। अथवा एक ही समय चारों प्रहरों के लिये संकल्प कर के पहले प्रहर की भांति पूजा करता रहे। पहले पूर्वोक्त द्रव्यों से पूजन कर के फिर जलधारा समर्पित करे। प्रथम प्रहर की अपेक्षा दुगुने मंत्रों का जाप कर के शिव की पूजा करे। पूर्वोक्त तिल, जौ तथा कमल पुष्पों से शिव की अर्चना करे। विशेषतः बिल्व पत्रों से परमेश्वर शिव का पूजन करना चाहिये। दूसरे प्रहर में बिजौरा नींबू के साथ अर्घ्य दे कर खीर का नैवेद्य निवेदन करे। जनार्दन! इसमें पहले की अपेक्षा मंत्रों की दुगुनी आवृत्ति करनी चाहिये। फिर ब्राह्मणों को भोजन कराने का संकल्प करे। शेष सब बातें पहले की ही भांति तब तक करता रहे, जब तक दूसरा प्रहर पूरा न हो जाए।

तृतीया प्रहर

तीसरे प्रहर के आने पर पूजन तो पहले के समान ही करे; किंतु जौ के स्थान में गेहूँ का उपयोग करे और आक के फूल चढ़ाये। उसके बाद नाना प्रकार के धूप एवं दीप दे कर पुए का नैवेद्य भोग लगाये। उसके साथ भांति-भांति के शाक भी अर्पित करे। इस प्रकार पूजन कर के कपूर से आरती उतारे। अनार के फल के साथ अर्घ्य दे और दूसरे प्रहर की अपेक्षा दुगुना मंत्र जप करे। तदनंतर दक्षिणा सहित ब्राह्मण भोजन का संकल्प करे और तीसरे प्रहर के पूरे होने तक पूर्ववत्‌ उत्सव करता रहे।

चतुर्थी प्रहर

चौथा प्रहर आने पर तीसरे प्रहर की पूजा का विसर्जन कर दे। पुनः आवाहन आदि कर के विधिवत पूजा करे। उड़द, कँगनी, मूँग, सप्त-धान्य, शंखी-पुष्प तथा बिल्व पत्रों से परमेश्वर शंकर का पूजन करे। उस प्रहर में भांति-भांति की मिठाइयों का नैवेद्य लगाये अथवा उड़द के बड़े आदि बना कर उनके द्वारा सदाशिव को संतुष्ट करे। केले के फल के साथ अथवा अन्य विविध फलों के साथ शिव को अर्घ्य दे। तीसरे प्रहर की अपेक्षा दूना मंत्र जप करे और यथाशक्ति ब्राह्मण भोजन का संकल्प करे। गीत, वाद्य तथा नृत्य से शिव की आराधना पूर्वक समय बिताये। भक्त जनों को तब तक महान्‌ उत्सव करते रहना चाहिये, जब तक अरुणोदय न हो जाये। अरुणोदय होने पर पुनः स्नान कर के भांति-भांति के पूजनोपचारों और उपहारों द्वारा शिव की अर्चना करे। तत्पश्चात अपना अभिषेक कराये, नाना प्रकार के दान दे प्रहर की संख्या के अनुसार ब्राह्मणों तथा सन्यासियों को अनेक प्रकार के भोज्य पदार्थों का भोजन कराये। फिर शंकर को नमस्कार कर के पुष्पांजलि दे और बुद्धिमान पुरुष उत्तम स्तुति कर के निम्नांकित मंत्रों से प्रार्थना करे –

तावकस्त्वद्गतप्राणस्त्वच्चित्तोऽहं सदा मृड ।
कृपानिधे इति ज्ञात्वा यथा योग्यं तथा कुरु ॥
अज्ञानाद्यदि वा ज्ञानाज्जपपूजादिकं मया ।
कृपानिधित्वाज्ज्ञात्वैव भूतनाथ प्रसीद में ॥
अनेनैवोपवासेन यज्जातं फलमेव च ।
तेनैव प्रीयतां देवः शंकरः सुखदायकः ॥
कुले मम महादेव भजनं तेऽस्तु सर्वदा ।
माभूत्तस्य कुले जन्म यत्र त्वं नहि देवता ॥

‘सुखदायक कृपानिधान शिव! मैं आपका हूँ। मेरे प्राण आपमें ही लगे हैं और मेरा चित्त सदा आपका ही चिंतन करता है। यह जान कर आप जैसा उचित समझें, वैसा करें। भूतनाथ! मैंने जान कर या अंजान में जो जप और पूजन आदि किया है, उसे समझ कर दया सागर होने के नाते ही आप मुझपर प्रसन्न हों। उस उपवास व्रत से जो फल हुआ हो, उसी से सुख दायक भगवान शंकर मुझपर प्रसन्न हों। महादेव! मेरे कुल में सदा आपका भजन होता रहे। जहाँ के आप इष्ट देवता न हों, उस कुल में मेरा कभी जन्म न हो।‘

इस प्रकार प्रार्थना करने के पश्चात भगवान शिव को पुष्पांजलि समर्पित कर के ब्राह्मणों से तिलक और आशीर्वाद ग्रहण करे। जिसने इस प्रकार व्रत किया हो, उससे मैं दूर नहीं रहता। इस व्रत के फल का वर्णन नहीं किया जा सकता। मेरे पास ऐसी कोई वस्तु नहीं है, जिसे शिवरात्रि व्रत करने वाले के लिये मैं दे न डालूं। जिसके द्वारा अनायास ही इस व्रत का पालन हो गया, उसके लिये भी अवश्य ही मुक्ति का बीज बो दिया गया। मनुष्यों को प्रतिमास भक्ति पूर्वक शिवरात्रि व्रत करना चाहिये। तत्पश्चात इसका उद्यापन कर के मनुष्य साँगोपाँग फल लाभ करता है। इस व्रत का पालन करने में मैं शिव निश्चय ही उपासक के समस्त दुखों का नाश कर देता हूँ और उसे भोग-मोक्ष आदि सम्पूर्ण मनोवांछित फल प्रदान करता हूँ।

सूत जी कहते हैं – महर्षियों! भगवान शिव का यह अत्यंत हित कारक और अद्भुत वचन सुन कर श्री विष्णु अपने धाम को लौट आये। उसके बाद इस उत्तम व्रत का अपना हित चाहने वाले लोगों में प्रचार हुआ। किसी समय केशव ने नारद जी से भोग और मोक्ष देने वाले इस दिव्य शिवरात्रि व्रत का वर्णन किया था।

शिवरात्रि व्रत का उद्यापन

ऋषि बोले – सूतजी! अब हमें शिवरात्रि व्रत के उद्यापन की विधि बताइये, जिसका अनुष्ठान करने से साक्षात भगवान शंकर निश्चय ही प्रसन्न होते हैं।

सूत जी ने कहा – ऋषियों! तुम लोग भक्ति भाव से आदर पूर्वक शिवरात्रि व्रत के उद्यापन की विधि सुनो, जिसका अनुष्ठान करने से वह व्रत अवश्य ही पूर्ण फल देने वाला होता है। लगातार चौदह वर्षों तक शिवरात्रि के शुभ व्रत का पालन करना चाहिये। त्रयोदशी को एक समय भोजन कर के चतुर्दशी को पूरा उपवास करना चाहिये। शिवरात्रि के दिन नित्य कर्म सम्पन्न कर के शिवालय में जा कर विधि पूर्वक शिव का पूजन करे। तत्पश्चात वहाँ यत्न पूर्वक एक दिव्य मण्डल बनवाये, जो तीनों लोकों में गौरी तिलक के नाम से प्रसिद्ध है। उसके मध्य भाग में दिव्य लिंगतोभद्र मण्डल की रचना करे अथवा मण्डप के भीतर सर्वतोभद्र मण्डल का निर्माण करे। वहाँ प्राजापत्य नामक कलशों की स्थापना करनी चाहिये। वे शुभ कलश वस्त्र, फल और दक्षिणा के साथ होने चाहिये। उन सब को मण्डप के पार्श्व भाग में यत्न पूर्वक स्थापित करे। मण्डप के मध्य भाग में एक सोने का अथवा दूसरी धातु तांबे आदि का बना हुआ कलश स्थापित करे। व्रती पुरुष उस कलश पर पार्वती सहित शिव की सुवर्णमयी प्रतिमा बना कर रखे। वह प्रतिमा एक पल (तोले) अथवा आधे पल सोने की होनी चाहिये या जैसी अपनी शक्ति हो, उसके अनुसार प्रतिमा बनवा ले। वाम भाग में पार्वती की और दक्षिण भाग में शिव की प्रतिमा स्थापित कर के रात्रि में उनका पूजन करे। आलस्य छोड़ कर पूजन का काम करना चाहिये। उस कार्य में चार ऋत्विजों के साथ एक पवित्र आचार्य का वरण करे और उन सब की आज्ञा ले कर भक्ति पूर्वक शिव की पूजा करे। रात को प्रत्येक प्रहर में पृथक-पृथक पूजा करते हुए जागरण करे। व्रती पुरुष भगवत्‌ सम्बन्धी कीर्तन, गीत एवं नृत्य आदि के द्वारा सारी रात बिताये। इस प्रकार विधिवत पूजन पूर्वक भगवान शिव को संतुष्ट कर के प्रातः काल पुनः पूजन करने के पश्चात सविधि होम करे। फिर यथाशक्ति प्राजापत्य विधान करे। फिर ब्राह्मणों को भक्ति पूर्वक भोजन कराये और यथाशक्ति दान दे।

इसके बाद वस्त्र, अलंकार तथा आभूषणों द्वारा पत्नी सहित ऋत्विजों को अलंकृत कर के उन्हें विधि पूर्वक पृथक-पृथक दान दे। फिर आवश्यक सामप्रियों से युक्त बछड़े सहित गौ का आचार्य को यह कह कर विधि पूर्वक दान दे कि इस दान से भगवान शिव मुझ पर प्रसन्न हों। तत्पश्चात कलश सहित उस मूर्ति को वस्त्र के साथ वृषभ की पीठ पर रख कर सम्पूर्ण अलंकारों सहित उसे आचार्य को अर्पित कर दे। इसके बाद हाथ जोड़ मस्तक झुका बड़े प्रेम से गदगद वाणी में महा प्रभु महेश्वर देव से प्रार्थना करे।

प्रार्थना

देवदेव महादेव शरणागतवत्सल ।
व्रतेनानेन देवेश कृपां कुरु ममोपरि ॥
मया भक्त्यनुसारेण व्रतमेतत्कृतं शिवा ।
न्यूनं सम्पूर्णतां यातु प्रसादात्तव शङ्कर ॥
अज्ञानाद्यदि वा ज्ञानाज्जपपूजादिकं मया ।
कृतं तदस्तु कृपया सफलं तव शङ्कर ॥

देवदेव! महादेव! शरणागतवत्सल! देवेश्वर! इस व्रत से संतुष्ट हो आप मेरे ऊपर कृपा कीजिये। शिव-शंकर! मैंने भक्ति भाव से इस व्रत का पालन किया है। इसमें जो कमी रह गयी हो, वह आपके प्रसाद से पूरी हो जाए। शंकर! मैंने अंजान में या जान-बूझकर जो जप-पूजन आदि किया है, वह आपकी कृपा से सफल हो।‘

इस तरह परमात्मा शिव को पुष्पांजलि अर्पण कर के फिर नमस्कार एवं प्रार्थना करे। जिसने इस प्रकार व्रत पूरा कर लिया, उसके उस व्रत में कोई न्यूनता नहीं रहती। उससे वह मनोवांछित सिद्धि प्राप्त कर लेता है, इसमें संशय नहीं है।

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