शिव पुराण में भगवान शिव के शरभ अवतार की व्याख्या की गयी है। नंदीश्वर और सनत्कुमार के अनुवाद में भगवान नंदीश्वर शिव के चमत्कारी रूप की कथा सुनाते हैं, जिन्होंने नरसिंह भगवान का क्रोध शांत किया था।

पूर्व कथा

जब असुर राज हिरण्यकशिपु अपने पुत्र प्रह्लाद को ही यातना देने लगा, तब भगवान विष्णु बहुत कुपित हुए। वे अति क्रुद्ध हो, गोधूलि बेला में, आंगन के एक खम्भे से, नरसिंह रूप धारण कर बाहर निकले। उनका शरीर भयंकर था। उनका वह प्रज्वलित शरीर दैत्यों के मन में भय उत्पन्न करने वाला था। नरसिंह ने दैत्यों को शीघ्र ही मार डाला, किंतु हिरण्यकशिपु से उनका घनघोर युद्ध हुआ। देवताओं के सामने भगवान नरसिंह ने उस दैत्य राज को द्वार तक घसीटा, फिर उन्होंने उसे अपने गोद में रख, उसका पेट अपने नखों से चीर दिया और उसका वध किया।

यद्यपि दैत्य राज हिरण्यकशिपु मारा जा चुका था, देवों को फिर भी सुख न मिल पाया। भगवान नरसिंह का रुद्र रूपी क्रोध शांत नहीं हुआ। सारा संसार उनके क्रोध से भड़क उठा। देवों की दयनीय परिस्थिति हो गयी और “अब क्या होगा” ऐसा विचार कर उन्होंने दूर ही रहने का निर्णय किया। परम पिता ब्रह्मा तथा अन्य देव भगवान विष्णु के उस रूप से व्याकुल हो उठे। उन्होंने प्रह्लाद को उनके समीप भेजने का निर्णय किया। जब प्रह्लाद नरसिंह भगवान के पास गये, तब उन दया सागर भगवान ने प्रह्लाद को गले लगा लिया। इससे उनका हृदय तो शांत हो गया किंतु क्रोध की ज्वाला तब भी नहीं शांत हुई।

तब व्याकुल देवों ने भगवान शिव की शरण ली। ब्रह्मा, देव और ऋषि गण शिव के पास जा कर सृष्टि के कल्याण हेतु उनकी प्रार्थना करने लगे। तब देवों की प्रार्थना से संतुष्ट हो दयावान भगवान शिव ने नरसिंह के क्रोध को शांत करने की प्रतिष्ठा की। उन्होंने अपने अति बलवान वीरभद्र रूप का स्मरण किया और अपने भैरव रूप को आमंत्रण दिया।

नरसिंह और वीरभद्र का सामना

वीरभद्र के आने पर भगवान शिव बोले – देवों पर एक आपात कालीन संकट आ गया है। नरसिंह की अग्नि धधक रही है। आप ही को इसका दमन करना होगा। पहले तो उनको आप समझा कर वश में करने का प्रयत्न करियेगा। किंतु अगर वे शांत नहीं हुए तब आप उनको मेरा रुद्र रूप दिखलाइयेगा। वीरभद्र! मेरी आज्ञा से, अपने क्रोध से उनका क्रोध और अपने तेज से उनका तेज शांत कर आप मुझे उनका मुण्ड और चर्म ला कर दे दीजियेगा।

इस प्रकार प्रार्थना करने से वीरभद्र शांत शरीर धारण कर शीघ्र ही वहाँ को चल दिये जहाँ नरसिंह बैठे थे। वहाँ पहुँच कर प्रलयकारी वीरभद्र ने विष्णु से वैसे ही समझाया जैसे कोई पिता अपने पुत्र को समझाता है।

भगवान शिव ने नरसिंह को हर प्रकार से समझाने का प्रयत्न किया। उन्होंने भगवान विष्णु को उनके कल्याणकारी कृत्यों और अवतारों का स्मरण कराया, उनकी वीरता की प्रशंसा की और क्रोध शांत करने का अनुग्रह किया। किंतु बहुत समझाने के बाद भी नरसिंह का क्रोध न शांत हो पाया। उन्होंने वीरभद्र का वध कर देने की धमकी दी। तब वीरभद्र को तनिक भी भय न हुआ, और उन्होंने भगवान नरसिंह से हँसते हुए कहा कि क्या वे पिनाक धारण किये प्रलयकारी शिव को भूल गये हैं। उन्होंने विष्णु को कहा कि यदि वे शीघ्र ही अपना क्रोध शांत न करेंगे तो उनका वध निश्चित है। इसपर नरसिंह का क्रोध और बढ़ गया और दोनों में घनघोर युद्ध प्रारम्भ हो गया। इसके आगे की कथा शिव पुराण के अनुसार यथा रूप है।

शरभ अवतार

नंदीश्वर ने कहा – इस प्रकार भगवान नंदीश्वर की बात सुन कर नरसिंह, क्रोध से विह्वल हो उठे। जोर से नाद करते हुए वे तीव्र वेग के साथ वीरभद्र की ओर लपके। अंतर्काल में शिव के तेज का ऐसा उद्भव हुआ कि सारा गगन उससे भर गया और वह तेज प्रत्यक्ष रूप में घोर भयंकर प्रतीत होता था। तत्क्षण वीरभद्र वहाँ अदृश्य हो गये। वे न हिरण्य रूप में थे, न सूर्य रूप में और न अग्नि रूप में। वे चंद्र रूपी महेश्वर के रूप में भी सदृश न होते थे। ऐसा प्रतीत होता था मानो समस्त तेज भगवान शंकर में तल्लीन हो गया हो। वे व्योम के रूप में भी प्रतीत नहीं होते थे। उस समय के उनके महा तेज की व्याख्या नहीं की जा सकती है। वे साधारण रुद्र थे या चिह्नित विकृत आकृति। तब उन परमेश्वर ने संहार रूप व्यक्त किया और यह देख कर वहाँ उपस्थित देव ‘जय’ शब्द का उच्चारण कर मंगल गाने लगे। उनके सहस्त्र हाथ थे, जटा धारण किये हुए उनके शिखर पर चंद्र शोभायमान था। उस द्विज रूप का अग्र शरीर समृद्ध था और वह पक्षी की भाँति चोंच और पंख धारण किये हुए थे। उनके दांत अति तीक्ष्ण थे और वज्र समान नख थे। उनका कण्ठ काले रंग का था और बड़े-बड़े चार हाथ और चार पैर थे। युग के अंत में होने वाले मेघों के समान उनकी गर्जना थी। उनके तीन नेत्र महा कुपित कृत्याग्नि की भाँति प्रतीत हो रहे थे। उनके दांत और ओष्ठ स्पष्ट दिख रहे थे और वे हुंकार का शब्द कर रहे थे। इस स्वरूप से शिव का आविर्भाव हुआ।

उनके दर्शन मात्र से ही भगवान विष्णु का बल और विक्रम नष्ट हो गया। नरसिंह का तेज सूर्य के समक्ष जुगनू के समान हो गया। उस तेज रूपी पक्षी ने नरसिंह का उदर और पद विदीर्ण कर दिया। भगवान शरभ ने नरसिंह के पदों को अपनी पूंछ से और उनके हाथों को अपने हाथों से पकड़ लिया। उन्होंने वहाँ उपस्थित देवों के तेज से नरसिंह का हृदय विदीर्ण कर दिया। जैसे कोई गिद्ध किसी सर्प को पकड़ लेता है, वैसे ही भगवान शरभ ने नरसिंह को पकड़ा। वे उनको ले कर उड़े और फिर बार-बार धरती पर पटका। फिर वे उनको ले कर आकाश में उड़ गये। तब भगवान विष्णु शिव के सामने विवश हो गये। सर्व देव उनकी स्तुति करने लगे। ब्रह्मा तथा अन्य मुनियों ने भी आदर पूर्वक उनको प्रणाम किया। भगवान नरसिंह तुष्ट हो भगवान शिव की ललित अक्षरों से प्रार्थना करने लगे। बार-बार प्रार्थना कर के फिर विष्णु ने शरभ से कहा। “जब-जब भी मेरी मति दूषित होगी, तब-तब आप ही इसका शोधन करेंगे।“

इस प्रकार भगवान शिव से यह कह कर नरसिंह पराजित हो गये और उनके जीवन का अंत हो गया। तत्क्षण वीरभद्र ने भी अपने भयंकर शरीर का विग्रह कर दिया। ब्रह्मा तथा सभी देव भगवान शिव, जिन्होंने शरभ के रूप में लोक कल्याण किया था, की प्रार्थना करने लगे।

देवों ने कहा

भगवान शिव! ब्रह्मा, विष्णु, इंद्र, चंद्र, देव, महर्षि और असुर सब आप ही से जन्म लेते हैं। हे सर्वेश्वर! आप ही ब्रह्मा, विष्णु तथा इंद्र, सूर्य आदि और सुर तथा असुर का सृजन तथा पतन भी करते हैं। आप ही संसार को हरते हैं, अतः बुद्ध आपको ‘हर’ कहते हैं। आपने ही विष्णु को हरा, अतः बुद्ध आपको ‘हर’ कहते हैं। आप ही अपने आप को अष्ट रूप से विभाजित कर, सारे संसार को साधते हैं। अतः हे भगवन! आप ही हम देवों की रक्षा करें। आप ही महा पुरुष, शम्भु, सर्वेश्वर, सुर नायक, निःस्वात्मा, निर्विकारात्मा, परब्रह्म और सत्व की गति हैं। आप ही दीन बंधु, दया सिंधु, अद्भुत, परात्मद्यक्‌, प्राज्ञ, विराट सत्य, सच्चिदानंद लक्षण हैं।

नंदीश्वर ने कहा - ऐसा सुनने के बाद भगवान शिव ने देवों तथा पुरातन महर्षियों से कहा।

भगवान शिव ने कहा – जैसे जल, जल में, दूध, दूध में और घी, घी में मिलता है, उसी प्रकार विष्णु का विलय शिव में हुआ है, और कुछ नहीं। वे तो नरसिंह के रूप में महाबली विष्णु ही थे जो सृष्टि का संहार करने आये थे। मेरे सभी भक्त सिद्धि प्राप्ति के लिये उनकी पूजा करेंगे। वे मेरे प्रवर भक्त भी है और भक्तों को वर भी देने वाले हैं।

नंदीश्वर ने कहा - ऐसा कहने के बाद, भगवान पक्षी राज जो महा बलवान थे, सब देवों के देखते ही देखते अंतर्ध्यान हो गये। गणों के अध्यक्ष भगवान वीरभद्र तब नरसिंह के अवशेषों को ले पर्वत पर चले गये। तभी से भगवान शिव नरसिंह के अवशेष धारण करने लगे और उनका मुण्ड भगवान शिव की मुण्ड माला का मुख्य मनका बन गया।

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श्रेणी: कथाएँ

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