ॐसरस्वती पूजा भारत में मनाए जाने वाले त्योहारों में एक महत्वपूर्ण त्योहार है। भगवती सरस्वती बुद्धि और ज्ञान की देवी हैं। वेदों की वाणी को उनका निवास स्थान माना जाता है। वे परम पिता ब्रह्मा की पत्नी हैं और जगन्माता भी हैं। वे दुर्गा, लक्ष्मी और पार्वती के साथ आदि शक्तियों में से एक हैं और ब्राह्मणों से सर्वोच्च पूजित हैं। विद्यार्थी देवी सरस्वती का विशेष रूप से पूजन करने के लिये अपेक्षित हैं क्योंकि वे ही सर्वस्व ज्ञान का आशीर्वाद देने में सक्षम हैं। हम उन देवी की जन्म तिथि वसंत पंचमी (माघ-शुक्ल-पंचमी) के दिन मनाते हैं और उनका पूजन करके ज्ञान की सिद्धि का आशीर्वाद माँगते हैं।

पूजा विधि

देवी-भगवत्‌-पुराण में भगवान्‌ नारायण ने सरस्वती पूजन की विधि नारद मुनि को बतलाई है।

नारद जी बोले – वेदवेत्ताओं में श्रेष्ठ प्रभु! आप भगवती सरस्वती की पूजा का विधान, कवच, ध्यान, उपयुक्त नैवेद्य, फूल तथा चंदन आदि का परिचय देने की कृपा कीजिए। इसे सुनने के लिए मेरे हृदय में बड़ा कौतूहल हो रहा है।

भगवान्‌ नारायण कहते हैं – नारद! सुनो! कण्व-शाखा में कही हुई पद्धति बतलाता हूँ। इसमें जगन्माता सरस्वती के पूजन की विधि वर्णित है। माघ-शुक्ल-पंचमी विद्यारम्भ की मुख्य तिथि है। पूर्वाह्ण काल में ही प्रतिज्ञा करके संयमशील बन जाए। पवित्र रहे, स्नान और नित्य क्रिया के पश्चात भक्ति पूर्वक कलश स्थापन करे। फिर अपनी शाखा में कही हुई विधि से अथवा तांत्रिक विधि के अनुसार पहले गणेश पूजन करे। तत्पश्चात इष्ट देवता सरस्वती का पूजन करना उचित है। फिर ध्यान करके देवी का आवाहन करे। तदनंतर व्रती रह कर षोडशोपचार से भगवती की पूजा करे।

सौम्य! भगवती की पूजा के लिये कुछ उपयोगी नैवेद्य वेद में कथित हैं। ताजा मक्खन, दही, दूध, धान का लावा, तिल के लड्डू, सफेद गन्ना, गुड़ में बना हुआ मधुर पकवान, मिश्री, सफेद रंग की मिठाई, घी में बना हुआ नमकीन पदार्थ, बढ़िया सात्विक चिउड़ा, शास्त्रोक्त हविष्यान्न, जौ अथवा गेहूँ के आटे से घृत में तले हुए पदार्थ, पके हुए स्वच्छ केले का पिष्टक, उत्तम अन्न को घृत में पका कर उससे बना हुआ अमृत के समान मधुर मिष्टान्न, नारियल, उसका पानी, कसेरू, मूली, अदरक, पका हुआ केला, बढ़िया बेल, बेर का फल, देश और काल के अनुसार उपलब्ध ऋतु फल, तथा अन्य भी पवित्र स्वच्छ वर्ण के फल – ये सब नैवेद्य के सामान हैं।

मुने! सुगंधित सफेद पुष्प और सफेद स्वच्छ चंदन देवी सरस्वती को अर्पण करना चाहिये। नवीन श्वेत वस्त्र और सुंदर शंख की विशेष आवश्यकता है। श्वेत पुष्पों की माला और भूषण भगवती को चढ़ावे। महाभाग मुने! भगवती सरस्वती का श्रेष्ठ ध्यान परम सुखदायी है तथा भ्रम का उच्छेद करने वाला है। वह वेदोक्त ध्यान यह है –

ध्यान

या कुन्देन्दुतुषारहारधवला
या शुभ्रवस्त्रावृता।
या वीणावरदण्डमण्डितकरा
या श्वेतपद्मासना।
या ब्रह्माच्युतशंकरप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता
सामां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा ॥

‘सरस्वती का श्री विग्रह शुक्ल वर्ण है। ये परम सुंदरी देवी सदा हँसती रहती हैं। इनके परिपुष्ट विग्रह के सामने कड़ोड़ों चंद्रमा की प्रभा भी तुच्छ है। ये विशुद्ध चिन्मय वस्त्र पहने हैं। इनके एक हाथ में वीणा है और दूसरे में पुस्तक। सर्वोत्तम रत्नों से बने हुए आभूषण इन्हें सुशोभित कर रहे हैं। ब्रह्मा, विष्णु और शिवप्रभृति प्रधान देवताओं तथा सुर गणों से ये सुपूजित हैं। श्रेष्ठ मुनि, मनु तथा मानव इनके चरणों में मस्तक झुकाते हैं। ऐसी भगवती सरस्वती को मैं भक्ति पूर्वक प्रणाम करता हूँ।‘

इस प्रकार प्रणाम करके विद्वान पुरुष पूजन के समग्र पदार्थ मूलमंत्र से विधिवत सरस्वती को अर्पण कर दे, फिर कवच का पाठ करने के पश्चात दण्ड की भाँति भूमि पर पड़ कर देवी को साष्टांग प्रणाम करे।

कल्प वृक्ष

मुने! जो पुरुष भगवती सरस्वती को इष्ट देवता मानते हैं, उनके लिये यह नित्य क्रिया है। “श्रीं ह्रीं सरस्वत्तयै स्वाहा” यह वैदिक अष्टाक्षर मूल मंत्र परम श्रेष्ठ एवं सब के लिये उपयोगी है। अथवा जिनको जिसने जिस मंत्र का उपदेश दिया है, उनके लिये वही मूल मंत्र है। ‘सरस्वती’ इस शब्द के साथ चतुर्थी विभक्ति जोड़ कर अंत में स्वाहा शब्द लगा लेना चाहिये। लक्ष्मी और योगमाया की आराधना में भी इसी मंत्र का प्रयोग किया जाता है। इस मंत्र को कल्प वृक्ष कहते हैं। चार लाख जप करने पर मनुष्य के लिये यह मंत्र सिद्ध हो जाता है। इस मंत्र के सिद्ध हो जाने पर अवश्य ही मनुष्य में बृहस्पति के समान योग्यता प्राप्त हो सकती है।

विप्रेन्द्र! सरस्वती का कवच विश्व पर विजय प्राप्त कराने वाला है। जगत्‌स्र्ष्टा ब्रह्मा ने गंधमादन पर्वत पर भृगु के आग्रह से इसे उन्हें बताया था, वही मैं तुमसे कहता हूँ सुनो।

सरस्वती कवच

कवचस्यास्य विप्रेन् ऋषिरेव प्रजापतिः ।
स्वयं छन्दश् बृहती देवता शारदाम्बिका ॥१॥
सर्वतत्वपरिज्ञानसर्वार् साधनेषु च ।
कवितासु च सर्वासु विनियोगः प्रकीर्तितः ॥२॥
ॐ श्रीं हृीं सरस्वत् स्वाहा शिरो मे पातु सर्वतः ।
ॐ श्रीं वाग्देवतायै स्वाहा भालं मे सर्वदाऽवतु ॥३॥
ॐ र्‍हीं सरस्वत्यै स्वाहे श्रोत्रे पातु निरन्तरम् ।
ॐ श्रीं र्‍हीं भगवत्यै स्वाहा नेत्रयुग्मं सदाऽवतु ॥४॥
ॐ एैं र्‍हीं वाग्वादिन्यै स्वाहा नासां मे सर्वदाऽवतु ।
ॐ र्‍हीं विद्याधिष्ठातृदेव्यै स्वाहा ओष्ठं सदाऽवतु ॥५॥
ॐ श्रीं र्‍हीं ब्राह्नण्यै स्वाहेति दन्तपंक्तिं सदाऽवतु
ॐ ऐमित्येकाक्षरो मन्त्रो मम कण्ठं सदाऽवतु ॥६॥
ॐ श्री र्‍हीं पातु मे ग्रीवां स्कन्धौ मे ॐ श्रीं सदाऽवतु ।
ॐ विद्याधिष्ठातृदेव्यै स्वाहा वक्षः सदाऽवतु ॥७॥
ॐ र्‍हीं विद्यास्वरुपायै स्वाहा मे पातु नाभिकाम् ।
ॐ र्‍हीं क्लीं वाण्यै स्वाहेति मम हस्तौ सदाऽवतु ॥८॥
ॐ सर्ववर्णात्मिकायै स्वाहा पादयुग्मं सदाऽवतु ।
ॐ वाग्धिष्ठातृदेव्यै स्वाहा सर्वं सदाऽवतु ॥९॥
ॐ सर्वकंठवासिन्यै स्वाहा प्राच्यां सदाऽवतु ।
ॐ सर्वजिह्वाग्रवासिन्यै स्वाहाऽग्निदिशिं रक्षतु सर्वदा ॥१०॥
ॐ ऐं र्‍हीं श्रीं क्लीं सरस्वत्यै बुधजनन्यै स्वाहा ।
सततं मन्त्रराजोऽयं दक्षिणे मां सदाऽवतु ॥११॥
ॐ ऐं र्‍हीं श्रीं त्र्यक्षरो मन्त्रो नैर्ऋत्यां सर्वदाऽवतु ।
ॐ ऐं जिह्वाग्रवासिन्यै स्वाहा मां वारुणेऽवतु ॥१२॥
ॐ सर्वाम्बिकायै स्वाहा वायव्ये मां सदाऽवतु ।
ॐ ऐ श्रीं क्लीं गद्यवासिन्यै स्वाहा मामुत्तरेऽवतु ॥१३॥
ॐ ऐं सर्वशास्त्रवासिन्यै स्वाहेशान्यां सदाऽवतु ।
ॐ र्‍हीं सर्वपूजितायै स्वाहा चोर्ध्वं सदाऽवतु ॥१४॥
ॐ र्‍हीं पुस्तकवासिन्यै स्वाहाऽधो मां सदाऽवतु ।
ॐ ग्रन्थबीजम्स्वरुपायै स्वाहा मां सर्वतोऽवतु ॥१५॥
इति ते कथितं विप्र ब्रह्ममन्त्रौघविग्रहम् ।
इदं विश्रजयं नाम कवचं ब्रह्मरुपकम् ॥१६॥

सनातन धर्म के अन्य त्योहारों के बारे में जानने के लिये यहाँ क्लिक करें। अथवा सनातन धर्म के बारे में अधिक जानने के लिये यहाँ क्लिक करें


0 टिप्पणियाँ

प्रत्युत्तर दें