ॐयह निर्विवाद है कि एक सच्ची सरकार लोगों के द्वारा, लोगों के लिए और लोगों की ही होती है। यहां तक कि जब जंगल का राजा शेर भी शिकार करता है, तब उसे कुछ नियमों के अनुसार रहना पड़ता है। एक सर्व-शक्तिशाली राजा भी अराजक और उग्र मार्ग पर नहीं जा सकता है अन्यथा उसे जनता के हाथों मृत्यु का सामना करना पड़ता है। लेकिन यह भी सच्चाई है कि सभ्यता के शिखर पर भी, प्रत्येक कार्य के लिए प्रत्येक व्यक्ति के वोट का होना अव्यावहारिक ही नहीं बल्कि असंभव भी है। एक राजनीतिक व्यवस्था आवश्यक हो जाती है जो समाज संबंधी निर्णय ले, जब जनता अपनी व्यक्तिगत दिनचर्या में व्यस्त रहे। शासन तंत्र के सदस्य अपनी सेवा के लिए वेतन प्राप्त करते हैं। और वे व्यक्तिगत बलिदान और शामिल जोखिमों के लिए शाही विशेषाधिकार का आनंद लेते हैं।

साधारणतः प्रकृति स्वयं ही जीवन की व्यवस्था का नियोजन कर देती है। बुद्धिमत्ता का प्रदर्शन तो तब होता है जब हम उस प्रक्रिया को नियोजित करें जिसके द्वारा हम राजनीतिक प्रणालियों का चुनाव और प्रतिस्थापना कर सकें। तीन बुनियादी तरीके हैं जिनसे हम यह हासिल करते हैं।

तानाशाही

तानाशाही एक अत्यंत दक्षिण-पंथी व्यवस्था है जिसमें एक व्यक्ति सब का अधिनायक होता है। पूर्व नेतृत्व और व्यवस्था तानाशाह को स्थापित करती है। संविधान लोगों के लिए दर्दनाक रूप से सख्त होता है और शासक इसे लागू करने के लिए क्रूर बल का उपयोग करता है। तानाशाह के विशेषाधिकार असाधारण होते हैं। लोगों को उतनी ही स्वतंत्रता मिलती है जितनी उनके तानाशाह की अनुमति होती है। राष्ट्रीय मामलों में उनका कोई अधिकार नहीं होता। तानाशाह सचिवालय की देखरेख ख़ुद ही करता है और सचिवालय को नाममात्र सलाहकार के रूप के अतिरिक्त कार्यों में कोई स्वतंत्रता नहीं होती। इस प्रणाली का फ़ायदा यह है कि लोग राष्ट्रीय मामलों के बारे में कम से कम चिंतित रहते हैं और व्यक्तिगत प्रयासों में पूरी तरह से ध्यान केंद्रित कर सकते हैं। यदि तानाशाह ईमानदार हो, तो यह दुनिया की सबसे अच्छी राजनीतिक प्रणाली होगी।

नकारात्मक पक्ष

समस्या तब पैदा होती है जब तानाशाह बेईमान या भ्रष्ट हो जाये, और शासन को बदलने की जरूरत पड़े। इस प्रणाली में शासक का प्रतिस्थापन बहुत कठिन है। तानाशाह सभी संसाधनों और शक्तियों का एकमात्र मालिक होने के नाते हिंसक विद्रोह के बिना प्रतिस्थापित नहीं किया जा सकता। कई निर्दोष लोगों के जीवन को समाप्त कर और यदि जनता सफल हो, तो शासक की हत्या करने पर ही यह कार्य संभव होता है। अपने अंतोगत परिणाम का डर अगले तानाशाह को जनता पर और भी अधिक नियंत्रण लागू करने के लिए मजबूर करता है, और प्रणाली धीरे-धीरे जेल और गुलामी के स्तर तक पहुंच जाती है।

जनतंत्र

तानाशाही का विपरीत है लोकतंत्र। इस राजनीतिक व्यवस्था में, जनता राष्ट्र का मालिक होती है। वोट से सरकार चुनी जाती है, और शासन तंत्र केवल लोगों का प्रतिनिधि होता है। लोग ‘कानून का नियम’ के मुहावरे को बहुत महत्व देते हैं, जिसका अर्थ है कि सत्ता कुर्सी में है, व्यक्ति में नहीं। इस प्रणाली का फ़ायदा यह है कि जनता सीधे सत्ता में होती है, इसलिए बहुमत हमेशा जीतती है। यह राष्ट्र को कम से कम प्रतिरोध के मार्ग पर आगे बढ़ने में सक्षम बनाता है। (हालांकि यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि कम से कम प्रतिरोध का मार्ग हमेशा सही रास्ता नहीं होता। दार्शनिक रूप से कहा जाए तो अगर कंडक्टर में कोई प्रतिरोध नहीं है, तो कोई प्रकाश या गर्मी भी नहीं होगी।) व्यवस्था में परिवर्तन और विद्रोह अकसर शांतिपूर्ण और अहिंसक होते हैं।

नकारात्मक पक्ष

इस प्रणाली का नकारात्मक पहलू उतना ही प्रत्यक्ष है जितना 'सांस' से 'चेतना' या 'मान' से 'अहंकार' का संबंध। मुझे नहीं लगता कि मैं किसी भी ऐसे व्यक्ति को खोज सकता हूं जो इसे चुनौती दे सकता है कि किसी भी समय, वास्तव में बुद्धिमान लोगों की आबादी मूर्खों की आबादी की तुलना में कम होती है। ऐसे परिदृश्य में मूर्खों की बहुमत, बुद्धिमान अल्पसंख्यक को दबा देती हैं। परिणाम स्वरूप ऐसे कानून पारित होते है जो अंत में खुद जनता को ही परेशान करते हैं। और यदि आबादी भी साक्षर हो तो भी जनतंत्र में इस मुहावरे - "जरूरत से अधिक रसोइए पकवान को खराब कर देते हैं", का साक्षात्कार होता है।

इस राजनीतिक व्यवस्था में सारे पाप-कर्म इसी लिये होते हैं क्योंकि हर कुछ सालों में शासकों के गर्दन पर चुनाव की तलवार लटक जाती है। इसलिए वे राष्ट्र को चलाने के बजाय, सत्ता को बनाए रखने की कोशिश में समय और संसाधनों के एक बड़े हिस्से का निवेश करते हैं। यह अति दुराचार और भ्रष्टाचार के लिए भी जगह बनाता है। अंतर राष्ट्रीय गठबंधन देश को विभाजित करते हैं। लालची निगम और अवसरवादी, मेहनती लोगों के संसाधनों और करों को खा जाते हैं। यह प्रणाली शासकों के लिए जनता की निष्ठा और जनता के लिये शासकों की सेवा का भी दमन करती है। अंततः यह सरकारों के खिलाफ लोगों की निरंतर और अंतहीन लड़ाई को जन्म देती है। और जल्द ही लोकतंत्र अराजकता में बदल जाता है।

साम्राज्य

इससे पहले कि मैं राजशाही के बारे में कुछ भी कहूं, यह जान लेना आवश्यक है कि ऐतिहासिक रूप से, जिन राज तंत्रों को हमने जाना है, उनमें से अधिकांश उसकी परिभाषा पर खरे नहीं उतरते। वे सभी या तो तानाशाही के करीब थे, या तानाशाही और लोकतंत्र के बीच एक निर्संधियुक्त संयोग। अगर किन्हीं को उत्सुकता हो, तो वे महाभारत के 'शांति पर्व' में राजतंत्र का सही अर्थ पढ़ सकते हैं।

आदर्श व्यवस्था

इस प्रणाली में, एक राजा या रानी (क्षत्रिय) जनता पर शासन करता है और वंश व योग्यता के संयुक्त आधार पर सत्ता में आता है। लोग उसे सर्वोच्च राजा (भगवान) के प्रतिनिधि के रूप में स्वीकारते हैं और इस प्रकार वह धर्म को स्थापित करता है। मंत्रियों के समूह (क्षत्रिय) शासक के सचिव होते हैं, जनता के प्रतिनिधि नहीं। जनता सीधे शासक को धमका या बदल नहीं सकती है किंतु विकट परिस्थिति में शासक को पद छोड़ना पड़ता है नहीं तो राज्य के मंत्री और ब्राह्मण इस कार्य को सम्पन्न करते हैं। ब्राह्मण सेवा (शिक्षा, कला, अनुसंधान आदि) प्रदान करके कमाते हैं। वे शाही धन को साझा नहीं करते, जिससे वे शासक की तुलना में आम लोगों के लिए अधिक वफादार होते हैं। यह ऊपर से नीचे के भ्रष्टाचार पर नियंत्रण रखता है।

राजा या रानी के एकमात्र मालिक होने के कारण भ्रष्ट होने का कोई कारण नहीं होता। बिचौलिए या राजनेता भ्रष्ट हो सकते हैं, लेकिन शासक और जनता के बीच बंधे होते हैं। इसके विपरीत, राजनेताओं को प्रोत्साहन भी रहता है कि अगर वे अपना काम ठीक-ठीक करते हैं तो वे राष्ट्र के सुपर-स्टार बन सकते हैं। जनता उन्हें प्यार करती है, और धन का कोई सरोकार नहीं होता।

आम व्यक्ति किसी भी अन्यायपूर्ण नियम के खिलाफ अपने अधिकारों के लिए लड़ सकता है। लेकिन उसके पास अपने कौशल को व्यक्तिगत कार्यों पर केंद्रित करके राजनेताओं पर राष्ट्र हित का दायित्व डाल देने का विशेषाधिकार भी होता है। कानून लोकतांत्रिक होता है, लेकिन सर्वोच्च निर्णय हमेशा राजा और मंत्रियों के आरक्षित हाथों में होता है। यह मूर्खता पूर्ण निर्णयों के नुकसान के खिलाफ एक कवच का काम करता है। तानाशाही के विपरीत, इस राजनीतिक व्यवस्था में सत्ता का प्रतिस्थापन रक्तपात के बिना भी संभव है लेकिन लोकतंत्र के समान आसान भी नहीं होता।

नकारात्मक पक्ष

यदि आम आदमी अनपढ़ और अनजान है तो यह राजनीतिक व्यवस्था तानाशाही में आसानी से बदल सकती है। इसलिए यदि आम लोग एक राष्ट्र को संचालित करने में उनकी भूमिका और सीमाओं को समझते हैं अथवा पर्याप्त शिक्षित हैं तो यह प्रणाली दोषरहित रूप से काम कर सकती है।

भारत का संविधान

भारत में एक लोकतांत्रिक संविधान है, जो राजशाही पद्धति पर आधारित है। उदाहरण के लिए, ऊपरी सदन के एक अध्यक्ष और सदस्य होते हैं जो सशस्त्र बल का नेतृत्व करते हैं। सचिवालय के रूप में संविधान के अधिकारी हैं। निचले सदन के सदस्य लोगों के प्रतिनिधि होते हैं। मतभेदों का उल्लेख करने के लिए, मंत्रियों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा नहीं बल्कि लोगों द्वारा की जाती है। एक कानून पर अंतिम शब्द राष्ट्रपति का है, लेकिन नाममात्र ही है। वास्तव में, सेनाओं और प्रशासनिक प्रमुखों को मंत्री होना चाहिए और विधायकों अथवा सांसदों को केवल बहस करनी चाहिए किंतु निकायों पर अधिकार नहीं होना चाहिए। हिंदू धर्म के अनुसार, क्षत्रिय (सशस्त्र बल और प्रशासनिक निकायों के प्रमुख) निष्पादन के लिए उत्तरदायी हैं न कि ब्राह्मण (विधायक और सांसद)। यह विशेषाधिकार और कार्य में जोखिम के संतुलन के लिए जरूरी है।

यह बतलाना अति आवश्यक है कि ब्लॉग मात्र के माध्यम से व्यवस्था को बदलने के लिए किसी से भी आग्रह करना बहुत मूर्खता पूर्ण काम होगा। साथ ही, मैं किसी क्रांतिकारी बदलाव में आस्था भी नहीं रखता। मेरा मानना है कि जब इच्छा होगी तब भगवान खुद ही बदलाव लायेंगे। जब हमारे संविधान में एक आदर्श ढांचा तैयार है तब हमारे पास वैसी प्रणाली न होने का कुछ तो कारण जरूर होगा। मैंने केवल एक दृष्टिकोण से जानकारी और समझ के लिए इस ब्लॉग को लिखा है ताकि कोई अपने निजी जीवन की योजनाएं मिथकों के आधार पर नहीं अपितु ज्ञान की रोशनी में बना सके।


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