ॐहमने प्रौद्योगिकी में अतुलित प्रगति की है और हम मानते हैं कि यह हमारी चेतना का अपूर्व स्थिति से विकास करती है। किंतु क्या हम सच-मुच यह जानते हैं कि चेतना क्या है? क्या हम वास्तविक रूप से अपने आवरण की जानकारी रखते हैं? क्या प्रौद्योगिकी और चेतना एक ही शब्द के दो अर्थ हैं?

सजीव और निर्जीव

इन प्रश्नों का उत्तर देने से पहले हमारे लिये यह जानना आवश्यक है कि चेतना है क्या? मेधा या चेतना वैज्ञानिकों, दार्शनिकों, मनोवैज्ञानिकों और धर्मियों के द्वारा शोधित एक बहुत पुराना विचार है। मनोवैज्ञानिक यह नहीं परिभाषित करते कि चेतना का क्या स्रोत है, बल्कि वे चेतना से प्रभावित क्रियाओं का शोध करते हैं। दार्शनिक और धर्मी चेतना को आत्मा के स्वभाव के रूप में परिभाषित करते हैं और कहते हैं कि यह शरीर को ज्ञान और कर्म इंद्रियों के द्वारा संचालित करती है। वैज्ञानिक इसे एक चमत्कारी वैशेषिक तथ्य पर अणुओं, परमाणुओं और अंततः अंग-प्रत्यंग के माध्यम से जीवन के संचार का कारण मानते हैं।

उदाहरण स्वरूप हम किसी पाषाण को एक ऋंग पर पड़ा हुआ देखते हैं। किसी कारण वश वह वहाँ से लुढ़क कर नीचे गिरता है और विभिन्न क्रियाओं व रसों से संपर्क में आ कर उसका रूप बदल जाता है। किसी पर्वत पर बर्फ पिघलती है और बह कर नदी बन जाती है जो कि भूमि के स्वभाव से कहीं सागर में मिल जाती है। और कोई खरगोश किसी उपवन में घास खा रहा होता है जो किसी बाज़ को देख अपने बिल में छुप जाता है। हम कह सकते हैं कि पाषाण और जल निर्जीव-जड़ हैं, किंतु खरगोश सजीव-चेतन है।

जीवों में ज्ञान वर्धन का विशेष स्वभाव

हम कह सकते हैं कि निर्जीव वस्तु संसार के साधारण नियमों से संचालित होते हैं किंतु सजीव बुद्धि और ज्ञान वर्धन से अति जटिल कर्मों को प्रदर्शित करते हैं। इन्हीं कर्मों का शोध वैज्ञानिकों व मनोवैज्ञानिकों द्वारा चेतना के प्रभाव के रूप में किया जाता है। वे कहते हैं कि चेतन जीवों को ज्ञान इंद्रियों के माध्यम से अपने आवरण का ज्ञान होता है और बुद्धि व कर्म इंद्रियों के माध्यम से वे प्रतिकार करते हैं। यही कारण है कि एक मृत जीव, जीवात्मक भेदों से बना हुआ होने पर भी मृत क्यों कहलाता है। किंतु प्रश्न तो तब भी उठता है कि बहुत सी वस्तुएँ बहुत जटिल कार्यों का संपादन करने पर भी चेतन क्यों नहीं कही जातीं।

इसका उत्तर हम जीव में ज्ञान वर्धन के वैशेषिक गुण से देते हैं। जहाँ निर्जीव भौतिक वस्तु अनंत काल से उन्हीं नियमों पर चले आ रहे हैं जो सृष्टि के आदि में थे, वहीं जीव कुछ ही समय में अपने नियमों को बदल देते हैं और ज्ञान वर्धन से एक ही परिस्थिति में भिन्न प्रवृत्ति का उदाहरण देते हैं। यदि हम वायु को एक अपरिवर्तनीय स्थिति में रख दें तो वायु के परमाणु अकाल भेद से वैसे ही प्रविर्त्त होंगे जैसे थे। किंतु किसी खरगोश को उसी स्थिति में रखने पर भी हमें उसमें परिवर्तन देखने को मिलेगा।

किंतु यह प्रयोग निरर्थक है, क्योंकि अपरिवर्तनीय स्थिति काल्पनिक है। वास्तविकता में यदि हम ऐसी स्थिति बना भी दें तो खरगोश पलक झपकते ही मर जायेगा। तथ्य यह है कि जहाँ वायु के वस्तु-भेदों ने एक सम्यावस्था बना ली है जो बाहरी प्रभाव के बिना नहीं बदलती, खरगोश के वस्तु-भेद अति क्रिया शील और असंतुलित अवस्था में रहते हैं। वैज्ञानिकों के पास इसका कोई उत्तर नहीं है कि कौन सी चीज़ किसी वस्तु को जीव या निर्जीव बनाती है। वे तो बस इतना ही कह सकते हैं कि जीवन जीवों के द्वारा समझा जाना असंभव है। किंतु यदि हम पुराणों में कथित काल और त्रिशूल-डमरू धारी रुद्र को समझ लें तो कदाचित यह असंभव नहीं लगेगा।

धर्म और विज्ञान का मेल

दार्शनिक चेतना को उत्तेजन तथा प्रतिक्रिया के प्रभाव के रूप में न जान कर चेतना ही को उत्तेजन तथा प्रतिक्रिया का कारण मानते हैं। जिसे वैज्ञानिक जीवन कहते हैं, उसे ही दार्शनिक जीवात्मा जानते हैं। वे मानते हैं कि जीवात्मा प्रथम आप से चेतन होती है और आवरण से बाद में। यही कारण है कि जीव का उद्भव और प्रगति होती है, किंतु भूतों में परिवर्तन नहीं होता। यह सिद्धांत भी विशेष रूप से कुछ स्पष्ट नहीं करता। किंतु यदि हम विज्ञान और दर्शन को एकत्रित करें तो हमें धर्म का उत्तर प्राप्त होता है। जीव-निर्जीव सभी परमेश्वर के ही अंग-प्रत्यंग से उपजे हैं। आत्मा जब चाहे जिस भूत का आवरण कर जीव का रूप धर लेती है और जब चाहे तब वस्त्र की भाँति एक शरीर से दूसरे शरीर में परिवर्तित हो जाती है। प्रतीकात्मक एक ही जीवन में भी शरीर बदलता रहता है और उसी के साथ जीवात्मा भी बदलती रहती है। जो हम एक क्षण पहले थे वो अब नहीं हैं और एक क्षण बाद भी नहीं होंगे। किंतु यह शरीर परमात्मा का निवास स्थान मात्र है जो अमर, अटल, अभेद्य, अकाट्य इत्यादि है। जीवन तो ब्रह्म के उद्भव में निमित्त मात्र है जिसकी आयु अणुओं के संघटन के समय निकले परमाणुओं के भाँति होती है और जो अंत में ब्रह्म ही में लीन हो स्थायी हो जाते हैं।

जीवों में चेतना

दार्शनिक चेतना पर शोध करने के क्रम में बहुत से प्रश्न करते हैं। क्या चेतना को नापा जा सकता है या यह सभी शरीरों में सामान्य रूप से रहती है। बहुत से मान बिन्दुओं पर चेतना शरीर को संचालित करती है।

उदाहरण के लिये एक सर्प किसी चूहे के शरीर से निकली उष्मा से उसको देख लेता है। वहीं मनुष्य प्रकाश का सहारा लेता है। कोई दूसरी वस्तु जो वैसी ही ऊष्मा उत्पन्न करे सर्प को धोखा दे सकती है। किंतु मनुष्य रूप, रंग, और रचना तीनों ही से उस फर्क तो पहचान लेता है। तो क्या प्रकाश की दृष्टि ऊष्मा से बेहतर है? किसी झाड़ी में छुपे हुए चूहे को तो सर्प ही देख पायेगा। वास्तविकता में हर इंद्रिय का अपना स्थान है और दो जीवों के किसी इंद्रिय की सक्षमता और वस्तुता में भी कोई प्रतियोगिता नहीं है। किंतु अधिक से अधिक इंद्रिय शक्ति अवश्य ही किसी जीव को अधिक चेतन बना देगी। कल्पना करें कि यदि किसी जीव की दृष्टि प्रकाश, ऊष्मा एवं ध्वनि तीनों ही निर्मित हो तो वह अवश्य ही अपने आवरण को समझने में अधिक समर्थ होगा।

दूसरे मान बिंदु पर क्या हम कह सकते हैं कि सर्प को चूहे की चेतनता का ज्ञान है। यदि हम सर्प के समक्ष कोई दण्ड भी रखें तो वह उसी डस लेता है। उसे इसका ज्ञान नहीं होता कि उसका विष एक निर्जीव दण्ड पर निरर्थक सिद्ध होगा। चाहे हम कितना ही कोई जीवात्मक पुतला क्यों न बना लें, किसी मनुष्य को भ्रमित कर पाना कठिन होता हैं। वहीं किसी पशु को हम आसानी से किसी पुतले के माध्यम से धोखा से सकते हैं। इस प्रवृत्ति को हम मनुष्य के विकसित मस्तिष्क और मेधा के नाम से जानते हैं। इसकी चर्चा हर बार होती है जब हम सोचते हैं कि क्यों मनुष्य आज यहाँ आ गया है और पशु-पक्षी अब भी उतना विकास नहीं कर सके।

तो क्या यह कहना उचित होगा कि मेधा भी एक इंद्रिय ही है जिसके प्रभाव से हम वैशेषिक कर्मों में स्थापित होते हैं। आज मनोवैज्ञानिक भी पाँच से अधिक इंद्रियों की कल्पना कर सकते हैं। सनातन धर्म में आठ इंद्रियाँ कही गयी हैं – श्रवण, स्पर्श, दृष्ट, स्वाद, घ्राण, मन, बुद्धि और अहंकार

सारांश

प्रौद्योगिकी ने हमारी बुद्धि का विकास किया है। भिन्न-भिन्न प्रौद्योगिकी उपकरणों से हम अपने आवरण का ज्ञान ले सकते हैं जो साधारण रूप से प्रकट नहीं होता। उदाहरण स्वरूप हम सूक्ष्म से सूक्ष्म चीज़ों को देख सकते हैं, दूर दृष्टि रख सकते हैं इत्यादि। तो इससे यह सिद्ध होता है कि प्रौद्योगिकी उपकरण हमें अधिक चेतन बनाते हैं। किंतु इससे यह सिद्ध नहीं होता कि आज की जीवात्मा अपने पूर्वजों से अधिक सिद्ध या ज्ञानी है। सनातन धर्म के अनुसार आत्मा और चेतनता भिन्न बतलायी गयी है। इस अनुसार आत्मा एक चेतन शरीर में निवास करती है और इंद्रियों के माध्यम से उसे संचालित करती है। चेतना तो आत्मा का साधन मात्र है जो जीविका उपार्जन के लिये उपयोगी है। यदि हम अपने इंद्रियों को वश में कर परमेश्वर में अपना ध्यान साधें तभी आत्मा सिद्ध होती है। और यदि आत्मा सच्चिदानंद परमेश्वर में सिद्ध हो उनका निवास स्थान बन जाये तो अखण्ड चेतन स्वरूप परमेश्वर ही जीवात्मा के माध्यम से दृष्टा हो जाते हैं। परम सिद्धि तो आत्मा ही की होती है, चेतनता की सिद्धि तो मनुष्य को जीविका का साधन दे सकती है या स्वर्ग तक पहुंचा सकती है। केवल आत्मा की सिद्धि मनुष्य को मोक्ष का मार्ग दिखाती है।


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