ॐहम जगत्‌स्रष्टा परम पिता ब्रह्मा को नमस्कार करते हैं। हम सर्वेश्वर अधिदैव शिव जी को अपना सर्वस्व समर्पण करने की चेष्टा से नमस्कार करते हैं। हम अपने पूर्वजों तथा गुरुओं, जिन्होंने हमें मनुष्य योनि में द्विज होने का वरदान दिया, को भी नमस्कार करते हैं।

पूरा विश्व एक अति संकट के काल से अभी ही बाहर निकला है और हमारे पूर्वजों ने अति वीरता पूर्ण हमें सुरक्षित रखने का कार्य सम्पन्न किया है। परंतु प्रश्न तो अब भी बनता है। क्या हम वास्तविक रूप से सुरक्षित और संतुष्ट हैं? क्या हममें पर्याप्त क्षमता है? या फिर क्या हम युग परिवर्तन के लिए उद्यत हैं?

समय के साथ हमारी अध्यात्म में रुचि मंद पड़ गयी है। हम आधुनिकरण में और उसकी उपलब्धि करने में अंध विश्वासी हो गये हैं। हम अपनी दूर दृष्टि से विमुख हो गए हैं और हमने धर्म तथा दर्शन से नाता तोड़ लिया है। परंतु कर्म और उसके अंतर्ज्ञान के बीच का सामन्जस्य ही हमें द्विज की उपाधि दे सकता है, और प्रगतिशील विचार ही अंत में हमें काल चक्र का शोधन करने में सहायता कर सकते हैं।

प्रतिशब्द – एक विचार

प्रतिशब्द एक विचार है जो ज्ञान एवं समय के संदर्भ में लोगों के नित्य क्रियाओं के पूर्वाधिकार की चर्चा करता है। ये लोगों की अंतर्दृष्टि का उत्कर्ष करने की चेष्टा रखता है। यह आम रीतिओं को आशंकित करता है अथवा ये आपसे, आपके दिशाहीन दिनचर्या से विराम ले कर आवश्यक वस्तुओं पर मंथन करने की प्रार्थना करता है।

हम प्रतिशब्द के माध्यम से छोटे से छोटे विचार में भी दर्शन का उपयोग करने की आकांक्षा से पाठकों को चिंतन करने के लिये उद्यत करने का भाव रखते हैं। प्रतिशब्द प्रौद्योगिकी, धर्म, दर्शन, कला अथवा विज्ञान इत्यादि के क्षेत्रों में तर्क-वितर्क करता है। यह जीवन के भौतिक, आध्यात्मिक, काल्पनिक एवं वास्तविक धरा तलों पर विवाद करता है। सर्वोपरि दृष्टि से यह जीवन में उपयोगी विचारों का उद्योग करने का प्रयास करेगा जो कि हमें भविष्यात्मक सन्निकट नवीन युग के अनुकूल और सहज बना सके। अंतोचित यह पाठकों को शांत और दूरगामी परिवर्तन के लिये उद्यत करेगा जिससे संसार सागर में विध्वंसकारी लहरों का प्रकोप न हो सके।

अंत में तो हमें ऐसी ही क्रांति चाहिये जो हमें भय तथा बंधनों से मुक्त कर दे और जो शांति तथा समृद्धि के मार्ग पर ले जाए। वास्तविकता में एक यही तो एक आवश्यक परिवर्तन है।


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