दिग्विजय शाही

दिग्विजय शाही

मैं अभी एक नवीन लेखक हूं और मैं ‘प्रतिशब्द’ नामक आध्यात्मिक ब्लॉग लिखता हूँ। भगवान के आशीर्वाद से जल्द ही मैं अपना पहला धार्मिक एवं आध्यात्मिक उपन्यास लिख पाऊंगा।

मेरा उद्देश्य

मैं तीसरी दुनिया के एक देश - भारत के एक मध्यम वर्गीय परिवार में जन्मा हूँ। जीवन निर्वाह के हेतु, मैंने कई कंपनियों के लिए विक्रय अधिकारी का काम किया। इस अवधि में मैंने नए-नए स्थानों की यात्रा की और मुझे नए-नए लोगों से मिलने का अनुभव हुआ। जैसे-जैसे समय बीतता रहा, वैसे-वैसे ही मुझे दुनिया और मेरे देश के लोगों में अप्रयुक्त क्षमता का आभास होता रहा। मैंने उस जीवन शैली का परित्याग, जो हमारे देश को पाश्चात्य संस्कृति ने उधार में दी थीं, करने का फैसला किया और भारत के विस्मृत साहित्य के बारे में लिखने का निर्णय किया। गुरुओं और पूर्वजों के माध्यम से जो संस्कृति हमें विरासत में मिली है, मुझे लगता है कि वह एकमात्र संसाधन है, जिसका विश्व में कोई मुकाबला नहीं है। परिणाम स्वरूप, मैंने दूसरों की रीतिओं को त्याग कर हमारे अजन-आजान सनातन धर्म को ही अपने जीवन का आधार बनाया।

कुछ द्योतक

“एक बार अगर हम मंद रूप से भी आत्म‌न्‌ के प्रति सचेत हो जाते हैं, तब संसार और हमारे भीतर की वास्तविकता हमें एक बहुत ही अलग पथ पर ले कर जाती है। वह अब न्याय की एक सभा न रह कर एक प्रकार की व्यायामशाला हो जाती है। अच्छाई और बुराई, दर्द और आनंद, तब भी मौजूद रहते हैं, लेकिन वे आत्मविश्वास से पूर्ण घोड़ों, रस्सियों और सलाखों की तरह लगते हैं, जिनका उपयोग हमारे शरीर को मजबूत बनाने के लिए किया जा सकता है। माया तब दर्द और आनंद का एक अंतहीन घूमने वाला पहिया नहीं, बल्कि एक ऐसी सीढ़ी हो जाती है जिस पर चढ़कर वास्तविकता की चेतना को जगाया जा सकता है। ” - आदि शंकराचार्य

"कुछ ही ऐसे हैं जो अपनी आँखों से देखते हैं और अपने दिल से महसूस करते हैं।" - अल्बर्ट आइंस्टीन

मेरी प्रेरणा

मैं अपनी पत्नी और अपने दो साल के बेटे के साथ भारत के बेंगलुरु शहर में रहता हूँ। एक भावना युक्त परिवार में पला-बढ़ा, मैं समवेदना ही को अपने हृदय का सूक्त मानता हूँ। मैं देश और दुनिया के शिक्षकों और नायकों का सम्मान करता हूं। ईश्वर के प्रति दृढ़ विश्वास और ऋषियों के प्रति समर्पण ही मुझे मेरे कर्मों में प्रेरित करता है।