ॐमकर संक्रांति भारत में फ़सल की कटाई पर मनाए जाने वाला त्योहार है। इसी हम अति उत्साह और उल्लास के साथ मनाते हैं। इस त्योहार में सूर्य देव की पूजा की जाती है। जब सूर्य एक राशि (धनु) से दूसरे राशि (मकर) में प्रवेश करते हैं तब हम इस त्योहार को मनाते हैं।

भविष्य पुराण में भगवान श्री कृष्ण ने संक्रांति व्रत का महात्म्य बतलाया है। उन्होंने युधिष्ठिर को इस व्रत की विधि का वर्णन सुनाया था।

राजा युधिष्ठिर ने पूछा – भगवान्‌ गोविंद! आप कोई ऐसा व्रत बतलाइये, जो सम्पूर्ण पापों का नाश करने वाला, आरोग्य दायक और अनंत फलप्रद हो।

व्रत विधि

भगवान्‌ श्री कृष्ण बोले – राजन! अब मैं संक्रांति के समय किए जाने वाले उद्यापन रूप अन्य व्रत का वर्णन कर रहा हूँ, जो इस लोक में समस्त कामनाओं के फल का प्रदाता और पर लोक में अक्षय फल दायक है। सूर्य के उत्तरायण या दक्षिणायन के दिन अथवा विषुवयोग में इस संक्रांति व्रत का आरम्भ करना चाहिये। इस व्रत में संक्रांति के पहले दिन एक बार भोजन करके (रात्रि में शयन करें।) संक्रांति के दिन प्रातः काल दातुन करने के पश्चात तिल मिश्रित जल से स्नान करना चाहिये। सूर्य संक्रांति के दिन भूमि पर चंदन से कर्णिका सहित अष्ट दल कमल की रचना करें और उस पर सूर्य का आवाहन करें। कर्णिका में ‘सूर्याय नमः’, पूर्व दल पर ‘आदित्याय नमः’, अग्नि कोण स्थित दल पर ‘सप्तार्चिषे नमः’, दक्षिण दल पर ‘ऋँन्ग मण्डलाय नमः’, नैऋत्य कोण वाले दल पर ‘सवित्रे नमः’. पश्चिम दल पर ‘वरुणाय नमः’, वायव्य कोण स्थित दल पर ‘सप्तसप्तये नमः’, उत्तर दल पर ‘मार्त्तण्डाय नमः’ और ईशान कोण वाले दल पर ‘विष्णवे नमः’ – इन मंत्रों से सूर्य देव को स्थापित कर उनकी बार-बार अर्चना करें। तत्पश्चात वेदी पर भी चंदन, पुष्प माला, फल और खाद्य पदार्थों से उनकी पूजा करनी चाहिये और अर्घ्य प्रदान करना चाहिये। पुनः अपनी शक्ति के अनुसार सोने का कमल बनवा कर उसे घृत पूर्ण पात्र और कलश के साथ ब्राह्मण को दान कर दें। तत्पश्चात चंदन और पुष्प युक्त जल से भूमि पर सूर्य देव को अर्घ्य प्रदान करें (अर्घ्य का मंत्रार्थ इस प्रकार है - )

“अनंत! आप ही विश्व हैं, विश्व आपका स्वरूप है, आप विश्व में सर्वाधिक तेजस्वी, स्वयं उत्पन्न होने वाले, धाता और ऋग्‌वेद, सामवेद एवं यजुर्वेद के स्वामी हैं, आपको बारंबार प्रणाम है।“

इस विधि से मनुष्य को प्रत्येक मास में सारा कार्य सम्पन्न करना चाहिये अथवा (यदि ऐसा करने में असमर्थ हो तो) वर्ष की समाप्ति के दिन यह सारा कार्य बारह बार करें (दोनों का फल समान ही है)।

उद्यापन

एक वर्ष व्यतीत होने पर घृत मिश्रित खीर से अग्नि और श्रेष्ठ ब्राह्मणों को भलीभाँति संतुष्ट करें और बारह गौ एवं रत्न सहित स्वर्णमय कमल के साथ कलशों को दान कर दें। इसी प्रकार सोने, चाँदी अथवा ताँबे की शेषनाग सहित पृथ्वी की प्रतिमा बनवाकर दान करना चाहिये। जो ऐसा करने में असमर्थ हों, वे आटे की शेष सहित पृथ्वी की प्रतिमा बना कर स्वर्ण निर्मित सूर्य के साथ दान कर सकता है। जब तक इस मृत्यु लोक में महेंद्र आदि देव गणों, हिमालय आदि पर्वतों और सातों समुद्रों से युक्त पृथ्वी का अस्तित्व है, तब तक स्वर्ग लोक में अखिल गंधर्व समूह उस व्रती की भलीभाँति पूजा करते हैं। पुण्य क्षीण होने पर वह सृष्टि के आदि में उत्तम कुल और शील से सम्पन्न हो कर भू तल पर सातों द्वीपों का अधीश्वर होता है। वह सुंदर रूप और सुंदर पत्नी से युक्त होता है, बहुत से पुत्र और भाई-बंधु उसके चरणों की वंदना करते हैं। इस प्रकार जो मनुष्य सूर्य-संक्रांति की इस पुण्यमयी अखिल विधि को भक्ति पूर्वक पढ़ता या श्रवण करता है अथवा इसे करने की सम्मति देता है, वह भी इंद्र लोक में देवताओं द्वारा पूजित होता है।

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