ॐआज के बुद्धिजीवी जनता को राजतंत्र, अर्थ-व्यवस्था और नीति-शास्त्र का ज्ञान देने में व्यस्त रहते हैं। कुछ पूंजीवादी हैं तो कुछ साम्यवादी। कुछ का मानना है कि हमें अपनी नीतियों को सुधारना चाहिये और कुछ कहते हैं कि संसार के उलझनों का उत्तर व्यापार को सुधारने से मिलेगा। मैं यह नहीं कहता कि यह सब आवश्यक नहीं है किंतु जनता के उत्थान में राज तंत्री मुद्दे नहीं आते। समाज के मानसिक-सुख के मान बिंदुओं पर अर्थ-व्यवस्था का पात्र नहीं होता। उदाहरण में हम विश्व की कुछ महाशक्तियों से सीख सकते हैं।

सिकंदर महान

विश्व की पहली ज्ञात महाशक्ति जो लघु काल तक रही परंतु विश्व में छाप छोड़ गयी। सिकंदर के काल में कुछ तथ्य नीचे कथित हैं।

राजतंत्र - दक्षिणपंथी राजशाही (अत्यधिक महत्वाकांक्षी)

अंतर्राष्ट्रीय नीति - संधियों और विवाह के साथ आक्रमण और उपनिवेश।

आदर्श - एक राज्य के तहत दुनिया को एकजुट करना और दबी हुई आबादी को न्याय दिलाना। धर्म पर महत्वाकांक्षा की प्राथमिकता।

उन्नति - युद्ध की रणनीतियों और हथियार प्रणालियों में वृद्धि

व्यापार - कुछ भी उल्लेख योग्य नहीं है।

शिक्षा - कई पुस्तकालयों की स्थापना और साहित्यिक कार्यों का संरक्षण।

जनता - अंतिम समय के विद्रोह को छोड़ कुल मिलाकर संतुष्ट और खुश; अंतोगत छोटे-छोटे प्रदेशों का आपस में लड़ कर पूर्व आधारित प्रणाली में लौटना और सार्वजनिक कल्याण व शिक्षा का नुकसान।

विश्व पर प्रभाव - मैं केवल अनुमान लगा सकता हूं, लेकिन उस समय के लोगों ने राज को तानाशाही (विद्रोह के परिणामस्वरूप) माना होगा। किंतु भविष्य में एक बड़ा प्रभाव और अच्छा नाम बनाया।

गुप्त काल

विश्व की अगली महाशक्ति भारत में गुप्त काल की हुई। वैसे तो यह भारत के स्वर्ण युग से प्रख्यात है किंतु वास्तव में इसे दुनिया का स्वर्ण युग कहा जाना चाहिए।

राजतंत्र – चरम दक्षिणपंथी राजशाही

अंतर्राष्ट्रीय नीति - भारतीय क्षेत्रों पर पूर्ण शासन। पड़ोसियों के साथ संधियाँ, और अन्य देशों के साथ व्यापार और साहित्यिक आदान-प्रदान का एक अच्छा मानक।

आदर्श सख्त हिंदू मान्यताओं से प्रेरित।

उन्नति विज्ञान, प्रौद्योगिकी, साहित्य, वास्तुकला और वाणिज्य में भारी वृद्धि की जिसने भारत को वह संपत्ति दी जो कई मंगोल आक्रमणों के बाद ब्रिटिश उपनिवेशवादियों की आतताओं तक बरकरार रही।

व्यापार यदि हम उसकी तुलना वर्तमान दुनिया से भी करें तब भी न केवल वस्तुओं बल्कि साहित्य और बुद्धि का व्यापार अपने चरम पर था।

शिक्षा साहित्यिक कार्यों का विशाल मात्रा में उत्पादन और पुनर्लेखन। दुनिया भर के छात्रों को मुफ्त शिक्षा प्रदान करने वाली असामान्य संस्थाएं। सुश्रुत (चिकित्सा), आर्यभट्ट (गणित), वराहमिहिर (खगोल विज्ञान, वास्तुकला), वात्स्यायन (दर्शन), कालिदास (संस्कृत लेखक) आदि की भारतीय कृतियों ने कई यात्रियों, छात्रों और साहित्यकारों को प्रेरित किया; दुनिया भर में कई साहित्यों के निर्माण की प्रेरणा (चीन, ग्रीस, रोम, अरब, मध्य एशिया आदि)।

जनता भारत का स्वर्ण युग। लेकिन इतिहासकार सख्त जाति व्यवस्था को लागू करने के लिए इसकी आलोचना करते हैं।

विश्व पर प्रभाव शांतिपूर्ण संधियों के साथ उत्कृष्ट व्यापार। तक्षिला, नालंदा और विक्रमशिला जैसे मुफ्त संस्थानों के माध्यम से दुनिया को साहित्य, वास्तुकला और प्रौद्योगिकी की प्रेरणा दी गई । कोई अनावश्यक युद्ध या शोकाकुल महत्वाकांक्षा नहीं।

ब्रिटिश काल

महाशक्तियों की सूची में अगला उल्लेख योग्य नाम ईस्ट-इंडिया कंपनी के प्रभाव में ब्रिटिश राजतंत्र है।

राजतंत्र – चरम दक्षिणपंथी राजशाही

अंतर्राष्ट्रीय नीति पूरी दुनिया के उपनिवेशित राष्ट्रों पर भारी टैक्स के साथ फ्रांस, पुर्तगाल आदि जैसे दावेदारों के साथ संधियाँ ।

आदर्श ईस्ट इंडिया कंपनी और आधुनिक ईसाई धर्म की महत्वाकांक्षाओं ने सत्ता चलायी।

उन्नति तथाकथित वैज्ञानिक क्रांति। उपनिवेशों से धन की लूट और घरेलू भूमि में एकत्रीकरण जो आज भी इंग्लैंड और अन्य यूरोपीय देशों को समृद्ध बनाता है।

व्यापार ईस्ट इंडिया कंपनी के माध्यम से बोगस व्यापार, बाद में राज्यों का उपनिवेश करना और उनका शोषण करने के लिए भारी कर लगाना।

शिक्षा तकनीकी शिक्षा में उन्नति। लेकिन भारत में जाति व्यवस्था के समान या बल्कि बदतर स्थिति से कुलीन वर्ग ने शिक्षा को खुद के लिए आरक्षित कर दिया। इसके अलावा, शासक वर्ग ने उपनिवेशों से साहित्य को लूटा और अपने महत्वाकांक्षी प्रचार का समर्थन करने के लिए साहित्य के अर्थों में हेरफेर किया। अन्य दर्शन पर वैज्ञानिक पत्रों और आलोचनात्मक टिप्पणियों के अलावा, कोई उल्लेख योग्य काम नहीं किया गया है।

जनता कुलीन वर्ग को आनंद मिला और उपनिवेशों के इतिहास में सबसे क्रूर शासन होने की उपाधि ली। गुलाम प्रथा, अमानवीय दंड प्रथा और आत्मघाती दिवालिया प्रणाली इसी काल की उपज हैं।

विश्व पर प्रभाव कई राष्ट्रों के इतिहास में एक काला अध्याय। मानसिक और शारीरिक यातनाएँ जिनसे वर्तमान तक की पीढ़ियाँ लड़ रहीं हैं। विश्व के पहले निगम का उदय (EIC) जिसने स्वार्थी नीतियों के साथ दुनिया का शोषण किया। राजाओं और रानियों ने निगम की महत्वाकांक्षा और क्रूरता की रक्षा की और उसे छिपाया; राजतंत्र में जनता के विश्वास को उखाड़ने के लिए अग्रणी।

अमेरिका, रूस और चीन

अंत में, रूस और चीन के खिलाफ प्रतिस्पर्धा करने वाले अमेरिका के संयुक्त राज्य, वर्तमान परिदृश्य में दुनिया के लिए मार्गदर्शक बने हैं।

राजतंत्र – वामपंथी समाजवाद (रूस) और दक्षिणपंथी कम्युनिस्ट (चीन) के साथ दक्षिणपंथी पूंजीवादी लोकतंत्र (यू.एस.ए) का मिश्रण

अंतर्राष्ट्रीय नीति व्यापार के माध्यम से प्रतियोगिता। प्राकृतिक संसाधनों पर लूट। अर्थव्यवस्था को नियंत्रित कर भ्रमिक प्रचार से लोकतांत्रिक जनता को मूर्ख बनाना।

आदर्श नेताओं के सत्ता और धन उपार्जन के व्यक्तिगत लक्ष्यों से अलग कोई आदर्श नहीं। विश्वास हासिल करने और जनसंख्या में भ्रम फैलाने के लिए धर्म, विज्ञान, दर्शन - ये सभी उपकरण हैं।

उन्नति एक अभूतपूर्व दर से विशाल तकनीकी प्रगति। चिकित्सा, स्वचल प्रणाली और ऊर्जा उत्पादन में अग्रिम।

व्यापार निगमों के एकाधिकार और संसाधनों पर नियंत्रण रखने के लिए प्रौद्योगिकी को प्रोत्साहन और जटिल नियमों के साथ अंतर्राष्ट्रीय व्यापार। बड़े निगमों का लोकतांत्रिक सरकारों को घूस देना, वोटों में बड़े पैमाने पर हेरफेर करना, और बदले में अपने लाभ में वृद्धि करने वाले कानूनों को लागू करना। आम आदमी पीड़ित और असहाय।

शिक्षा शिक्षा को सभी के लिए माना जाता है, लेकिन कोई भी योग्य शिक्षा इतनी महंगी है कि वह गरीब छात्रों के लिए निगमों द्वारा दासता सुनिश्चित करती है। उच्च शिक्षा मुख्य रूप से विज्ञान या कानूनों का गठन करती है जो किसी को अपने स्वार्थ के लिए प्रणाली को झुकाना और भ्रष्ट करना सिखाती है। नैतिक और धर्म शास्त्रीय अध्ययन प्रणाली केवल अपवाद स्वरूप ही हैं।

जनता अमीर और अमीर हो जाता है और गरीब और गरीब हो जाता है। एक ओर कहीं संसाधनों की अधिकता है, वहीं दूसरी ओर साफ पानी और भोजन के अभाव में मौतें हो रही हैं। औसत आबादी या मध्यम वर्ग के लोग गरीबी रेखा से नीचे गिरने के निरंतर भय से बचने और जीने के लिए संघर्ष करते हैं। भय एक बिंदु पर असहनीय हो जाता है और लोग अपराध, अवसाद, चिंता, आक्रोश और पलायनवाद के रास्ते पर चल देते हैं। सरकार और निगम अपने जघन्य कार्यों के लिए अपराध का उपयोग करते हैं। तानाशाही करने के लिए अवसाद, हेरफेर करने की चिंता, विभाजित करने के लिए नाराजगी और उपभोक्तावाद को बढ़ावा देने के लिए पलायनवाद। यही दुष्चक्र मानव सभ्यता को लाचारी और दर्द की जंजीरों से जकड़ा रहता है।

विश्व पर प्रभाव निगम अराजकता फैलाते हैं और समाज का एक नया विभाजन बनाते हैं जहां पड़ोसी दुश्मन हो सकता है और विदेशी मित्र हो सकता है। सरकारी प्रणालियाँ निराश्रय पूरे विश्व में अंतर-युद्ध और विद्रोह पैदा करती हैं। किसी विदेशी राष्ट्र या किसी निगम के नियंत्रण की खिलाफत आतंकवाद को जन्म देती है। ब्रिटिश उपनिवेश के बाद बुनियादी संसाधनों के संघर्ष करते लोगों का दमन तीसरी दुनिया के देशों में बढ़ते भ्रष्टाचार को जन्म देता है। दहशत और अविश्वास किसी भी भीड़ की मुख्य भावनाएं हैं। हम प्राकृतिक संसाधनों का ऐसे स्तर पर दोहन कर रहे हैं जो पूरी मानव जाति के लिए घातक हो गया है। बाकी सब वर्तमान में है, कुछ कहने की आवश्यकता नहीं।

सारांश

इतिहास में अन्य महाशक्तियां भी हैं जिन्होंने या तो किसी प्रमुख भूमि खण्ड पर शासन किया है या कई युद्ध जीतीं हैं या अविश्वसनीय रूप से समृद्ध थीं। लेकिन मैंने उन महाशक्तियों का उल्लेख करना उचित समझा, जिनमें न केवल सांख्यिकीय गुण हैं, बल्कि उनका प्रभाव दुनिया पर उसे खुद के बारे में सोच बनाने पर मजबूर करता है। मेरे विचार में, ये महाशक्तियाँ भूमि और समय की वास्तविक महाशक्तियाँ हैं। वैसे, मुझे पूरा यकीन है, कि अगर किसी अन्य शक्ति जैसे कि च्जार, मंगोल, आदि पर चर्चा की जाये, तो ऊपर दी गई सूची इस बात का ठोस प्रमाण देती है कि तकनीकी कारकों का किसी राज्य को महान बनाने में कोई प्रभाव नहीं है। बल्कि आदर्श ही हैं जो आम जनता के लिए मायने रखते हैं।


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