ॐहमें जीवन और उसके भावों के ज्ञान का वरदान प्राप्त है। मनुष्य अपने व्यवहार का प्रवृत्ति के विपरीत भी शासन कर सकता है। हम अपनी अचेत प्रतिक्रियाओं के विपरीत बुद्धिमान योजनाओं से निर्णय लेते हैं। हम भय का सामना करते हैं और सुख से भी वैराग का अनुभव करने में सक्षम हैं। ‘फ़ाइट या फ़्लाइट’ की प्रक्रिया हमारे संदर्भ में इतनी जटिल है कि हमें ख़ुद ही हमारे कृत्यों का कारण ज्ञात नहीं होता। अंत में सब भावों से परे हम एक ‘क्यों’ रूपी भाव उत्पन्न करते हैं। हम यह क्यों का प्रश्न न केवल विषय, वस्तु, काल, स्थान और पद्धति से करते हैं, बल्कि उद्देश्य से भी करते हैं। इस हेतु के ज्ञान की सक्षमता के कारण हम शेष प्राणियों से भिन्न हो बुद्धिमान हो जाते हैं। किंतु यही गुण हमारे मनोस्थिति को भ्रमित भी करता है। यही गुण वैज्ञानिकों, दार्शनिकों और मनोवैज्ञानिकों को यह सोचने पर विवश कर देता है कि यदि सारे संसार का ज्ञान हमें इंद्रिय मात्र से होता है और यदि इसकी सत्वता का परिचय हमें हमारा भ्रम वादी मन ही देता है, तो हम यह सम्पूर्ण विश्वास के साथ कैसे कह सकते हैं कि जीवन वस्तु स्थिति में सत्य है, बल्कि कोई स्वप्न रूपी भ्रम नहीं।

जीवन की सत्वता का प्रश्न

जीवन का मूल तत्व अहंकार है। आम रूप से हम अहंकार का अर्थ स्वार्थी गर्व से लगाते हैं, किंतु धर्म शास्त्रों में यह ‘आत्म-स्वरूप’ का सूचक होता है। अहंकार जीवन का वह मूल तत्व है हो हमें चेतनता प्रदान करता है। यह निस्संकोच हम में स्वार्थ की भावना भी उदित करता है जिससे हम शरीर को ही आत्मा मानने की भूल करते हैं। हम यह जानते हैं कि हमारा शरीर विभिन्न अंग-प्रत्यंगों से बना है और अंग सूक्ष्म वस्तुओं व अणुओं और परमाणुओं से बने हैं। किंतु हम अपने शरीर को दूसरों से भिन्न व विशेष मानते हुए यह नहीं समझ पाते कि दूसरे शरीरों की सुख-दुख की अनुभूति किस प्रकार की होती है।

बुद्धि के संयोग से हम अन्य वस्तुओं में अपने अहंकार तो स्थानांतरित कर सकते हैं और इससे हम में अनन्यता का भाव प्रकट होता है। इसी प्रवृत्ति से हमें संगति, संस्पर्श, समानता, भेद, विभाजन और विनिमय आदि का ज्ञान होता है। बुद्धि के भेद से हम वैशेषिक अहंकार का दमन कर हम वस्तु को उनके विभाजन स्वरूप और विभिन्न वस्तुओं के संगठन को एकत्व की दृष्टि से देख सकते हैं। यह प्रवृत्ति हमें वस्तु स्थिति का साम्य रूप से ज्ञान कराती है और हम शेष प्राणियों की तुलना में जटिल नीतियाँ बनाने में सक्षम हो पाते हैं।

अहंकार की संयोगिता

किंतु इस गुण से एक दोष प्रकट होता है जो आगे चल कर जीवन के घातक भ्रम का मूल कारण हो जाता है। बुद्धि की सहायता से अहंकार का अन्य वस्तुओं पर स्थानांतरण केवल एक ही दिशा में किया जा सकता है। हमारी ज्ञान इंद्रियाँ और मन केवल पंच भूतों का ही ग्राह कर सकता है। महत्तत्व, अहंतत्व और प्रकृति तो इंद्रियों और मन के परे खुद ही मूल तत्व हैं, अतः चित्त ज्ञान के परे हैं। इस स्थिति में हम अन्य वस्तुओं के भाव का अनुमान तो लगा सकते हैं, किंतु किसी भी अनुमान का प्रमाण प्राप्त नहीं कर सकते। हमने प्रमाण की गुत्थी सुलझाने के लिये विभिन्न प्रकार की भाषाएं तथा अभिव्यक्ति विकसित करते हैं। किंतु चाहे जितने भी शब्द हम बना लें, अपने शरीर से अन्य किसी भी शरीर का भाव हमें सूक्ष्मता से समझ नहीं आता। और भाषाएं तो जीवन मात्र की विशेषता है। दूसरे प्रजाती के जीव और जड़ वस्तुओं का ज्ञान तो और भी दुर्लभ हो जाता हैं।

हमारे जीवन के भ्रम की समस्या तब प्रकट होती है जब अहंकार के स्थानांतरण करते समय हम उन वस्तुओं से क्यों का प्रश्न भी करने लगते हैं। हम इस विज्ञान को भूल जाते हैं कि क्यों की भावना जीव-अहंकार का विशेषाधिकार है और अन्य वस्तुओं के उद्देश्य का ज्ञान होने से यह विशेषाधिकार सर्वथा नहीं रह जाता, अतः प्रकृति से वर्जित है।

अहंकार की विसंगति

इसके अतिरिक्त हम अहंकार के स्थानांतरण से उत्पन्न संस्पर्श और विनिमय की भावना से विभिन्न वस्तुओं को एक से अधिक रूप में जानने लगते हैं। उदाहरण के लिये हम प्रकाश को इंद्रियों से रूप तन्‌ मात्रा से ग्रहण करते हैं। साथ ही हम उसे विद्युत-चुम्बकीय क्षेत्रों की तरंगों के रूप में भी जानते हैं। हम उन्हीं तरंगों का कण रूप से भी अध्ययन करते हैं और उपकरणों की सहायता से ‘०’ और ‘१’ मात्र के उपयोग से सारे रंग निर्मित कर सकते हैं। दूसरा उदाहरण हैं कि रूप तन मात्रा का ग्राह मनुष्य की सूक्ष्म नेत्र इंद्रिय प्रकाश से करती है वहीं चमगादड़ रूप तन मात्रा का ग्राह अपनी सूक्ष्म नेत्र इंद्रिय से ही ध्वनि तरंगों से करते हैं। या फिर उष्मा का ज्ञान मनुष्य को स्पर्श तन्‌ मात्रा से होता है किंतु कुछ सर्प के मन उष्मा को रूप तन्‌ मात्रा से ज्ञात करते हैं। इन सब जानकारियों के बाद हम असमंजस में पड़ जाते हैं कि वस्तुतः प्रकाश है क्या अथवा दृष्टि क्या होती है। और यह सब अलग-अलग परिस्थिति में अलग गुण क्यों प्रकट करते हैं? वास्तविकता में हमारे लिये ये समझना सरल हो जाये यदि हम सापेक्षता का भी वैसे ही ग्रहण कर सकें जैसे अपनी भूख का करते हैं।

परिणाम स्वरूप हम यह निष्कर्ष निकाल लेते हैं कि जो कुछ भी हमें संसार का अनुभव है वह वास्तविक नहीं है। हम इस भ्रम से ग्रसित हो जाते हैं कि क्या वस्तु भेद हमारी इंद्रियों की धारणा मात्र हैं या हमारी धारणा भी उन्हीं का प्रक्षेपण है। हम यह चिंतन करने लगते हैं कि प्रतीकात्मक सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड वास्तविकता में सत्य है या केवल हमारे मन की एक कल्पना है अथवा हमारे सापेक्ष विश्वास का एक भाग है।

दर्शन

कथित प्रश्न का कदाचित कोई उत्तर नहीं है। वैदिक शास्त्रों के अनुसार संसार माया है। कुछ दार्शनिक कहते हैं कि जीवन स्वप्न मात्र है और आधुनिक वैज्ञानिकों का मनन है कि हम सब किसी परम कम्प्यूटर के अनुकरण में जीवित हैं। इस संदर्भ में एक मात्र तथ्य तो यही प्रतीक होता है कि जीवन का सत्य हमें परमेश्वर की सत्वता स्वीकारने को बाध्य करता है और ‘असंभव’ शब्द को अर्थ प्रदान करता है। प्रकृति के ये प्रतिबंध हमें यह भी संकेत करते हैं कि सत्व ज्ञान की जिज्ञासा भी सीमित है और सतो-गुण की अति से भी हमें संकोच करना चाहिये। जिज्ञासा की सीमा को आत्मज्ञान में समेट, हमें वर्तमान की वास्तविकता को ही सत्य स्वरूप समझना चाहिये। ऐसा करने से ही कोई व्यक्ति आस्तीक की संज्ञा का अधिकारी बन सकता है।

सारांश

इसके बाद भी यदि किसी व्यक्ति को जीवन की वास्तविकता पर संदेह है तो मैं एक प्रश्न करना चाहता हूँ। क्या हम इन प्रश्नों पर चिंतन उल्लास या भय के भावों में करते है। नहीं। हम इन प्रश्नों क स्मरण शांत काल में या तो किसी बीती बात के उपलक्ष रूप या भविष्य में किसी निर्णय के सहायक तथ्य को ढूंढने के लिये ही करते हैं। तो क्या यह प्रमाण यह नहीं दर्शाता कि इन प्रश्नों का चिंतन मनुष्य को उद्देश्य दर्शन मात्र के हेतु करना चाहिये। नित्य क्रिया में ऐसे प्रश्नों का हस्तक्षेप हमें कुण्ठा के अतिरिक्त और कुछ नहीं दे सकता। और यदि इन प्रश्नों की उपयोगिता उद्देश्य मात्र की खोज तक सीमित है तो हम अपना समय जीवन के सत्य का उपलक्ष खोजने में क्यों व्यर्थ करते हैं। हमें उद्देश्य और उपलक्ष जैसी भावनाओं को भगवान पर छोड़ अपना समय जीवन के सत्य की वास्तविकता के खोज में लगाना चाहिये। क्योंकि यही खोज प्रायोगिक भी है और जीव को क्रिया शक्ति भी प्रदान करता है।


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