पिछले ब्लॉग में मैंने लिखा था कि हिंदू धर्म किस प्रकार धर्मों को परिभाषित करता है। यह जानना रुचिकर कर लगता है कि किस प्रकार कोई धर्म अपने आप को परिभाषित करता है और किस प्रकार धर्म शास्त्री यही काम करते हैं। धर्म शास्त्री धर्म की परिभाषा संकल्प सूत्र, अभिव्यक्ति, सामाजिक प्रभाव और सांकेतिक अर्थों आदि के मान बिंदुओं पर देते हैं। परन्तु हिंदू धर्म यह अभिव्यक्ति मात्र से ही करता है। यद्यपि यह उपरोक्त विधाओं के अंतर्गत ही आता है, फिर भी इनकी भिन्नता से धर्म की परिभाषा बिल्कुल ही बदल जाती है।

आधुनिक युग में विद्या पद्धति में बहुत बदलाव आया है। वैज्ञानिक क्रांति ने विश्व को पलट कर रख दिया है। आज किसी भी खोज में यह आवश्यक हो गया है कि हम वैज्ञानिक पद्धति को ही अपनायें। शास्त्रविदों को एक यही युक्ति सत्यवादी लगती है। वैज्ञानिक पद्धति प्रश्न, खोज, अनुमान, प्रयोग, विश्लेषण और सारांश की युक्तियों के परिभाषित की जाती है। यह परोक्ष एवं निष्पक्ष होने के लिए भी प्रसिद्ध है।

यद्यपि हमें संसार में वास्तविक कोई ऐसा उदाहरण नहीं मिलता है जहाँ कि ये पद्धति अपनी ख्याति पर खरी उतरती हो, फिर भी उद्देश्य तो यही रहता है। इस पद्धति को जो ख्याति प्राप्त हुई, वह पश्चिमी सभ्यता के लिए तो स्वाभाविक ही थी। अपने उत्थान के समय पश्चिमी सभ्यता पक्षपात, आडम्बर, परिकल्पना आदि के दोषों से ग्रसित रही। उनकी सारी विद्याएं बाद में असत्य ही नहीं अपितु आडम्बरी और पक्षपाती भी सिद्ध हुईं। यह तो स्वाभाविक था कि आगे आने वाले पीढ़िओं ने एक निरपेक्ष अथवा परोक्ष पद्धति को अपनाया। परंतु जिस प्रकार किसी भी वस्तु की अति अच्छी नहीं होती, उसी प्रकार, यह पद्धति भी हर क्षेत्र में उपयोगी नहीं सिद्ध होती है। अगर हम धर्म को समझना चाहते हैं तो हमें मनोवाद का ही सहारा लेना पड़ता है। सनातन शास्त्रों ने इसका एक अद्वितीय उदाहरण दिया है कि किस प्रकार मनोवाद को हम बिना पक्षपात के प्रकट कर सकते हैं।

धर्म में मनोवाद

ज्ञान तो भगवत्‌ स्वरूप ही होता है। अगर कोई व्यक्ति किसी एक विद्या को किसी दूसरे से परे बतलाता है तो उसकी बुद्धि भ्रमित कहलाती है। विज्ञान, कला, व्याकरण, गणित ये सभी जीवन में उपयोगी हैं और व्यक्ति का उद्धार करते हैं। विज्ञान की विशेषता यह है कि वह वस्तु को परोक्ष दृष्टि से देखता है और सम्‌वरणीय सूत्रों का विकास करता है। किंतु हर क्षेत्र में परोक्ष दृष्टिकोण हमें आत्म तत्व से दूर ले जाता है। वाल्मीकि रामायण के अनुसार किसी भी कार्य की सिद्धि के लिये हमें छः युक्तियों की आवश्यकता होती है – संधि, विग्रह, यान, आसन, द्वैदिभाव और समाश्रय। इनमें से चौथी युक्ति आसन अति उपयोगी है। यह राजतंत्र में राजधानी की सूचक है और शोध में आत्म तत्व की। अर्थात किसी भी विद्या पद्धति में यदि हम आत्म तत्व से विमुख हो जाएं तो हम सर्वोच्च निष्कर्ष तक नहीं पहुंच सकते।

मनोवाद किसी भी विद्या में आवश्यक गुण है और धर्म एक ऐसा मार्ग है जिससे हम विज्ञान से सहज आत्मीयता को प्राप्त कर सकते हैं। यह भौतिकता और अध्यात्म के बीच सामंजस्य स्थापित करता है। दुख की बात तो यह है कि आज की धर्मचर्या या तो पक्षपाती और आडम्बरी हो कर विज्ञान के विपरीत चलती है और संसार को विलक्षण भेदों से विभाजित कर देती है, या फिर वह आधुनिक विज्ञान से हार मान कर भौतिकता के अधीन हो जाती है।

ओरवेलियन भाष्य

“आदि में शब्द था, शब्द भगवत्‌ शरणार्थी भी था और शब्द ही भगवत्‌ रूप भी था।“ बाइबल का यह कथन शब्द को ही प्रधान मानता है। किंतु आधुनिक युग में यह बात कहाँ रह गयी कि माध्यम को भी उपलक्ष की समानता दी जाए। क्या हम उपदेश करना भूल गए हैं? क्या हमें विचार को व्यक्त करने की अब कोई आवश्यकता नहीं है? या कि आज कोई भाष्य-जानकार रहा ही नहीं? कोई स्वीकारे या न, धर्म आदि-काल से ही सभ्यता का मार्ग दर्शक रहा है और यह कोई बनावटी कला नहीं बल्कि हमारे प्राण ग्रंथियों की प्राकृतिक समझ है। जिस प्रकार हमें प्रकाश की तरंगों का ज्ञान रंग व रूप से होता है, उसी प्रकार हमारा मस्तिष्क पराकृति की भी कल्पना करता है। यदि कोई कहे कि धर्म या आस्था बनावटी है तो उसे प्रत्यक्ष ज्ञान इंद्रियों की सारी तन्‌-मात्राओं को भी काल्पनिक मानने पर विवश होना पड़ेगा। यद्यपि सनातन धर्म तो सारे संसार को ही माया कहता है किंतु वास्तविक धरातल पर आत्मीयता के अनुसार हमें संसार को वस्तु रूप ही मानना पड़ता है। ऐसा न करने पर जीवन दुखद और कोलाहित हो जाता है। इसकी सर्वोच्च व्याख्या भगवान श्री कृष्ण ने गीता में की है जब वे कर्म योग को कर्म-सन्यास योग से उच्च स्तर का बतलाते हैं।

इस दोष का एक प्रत्यक्ष उदाहरण हमारे सामने आज की भाषा के रूप में प्रकट होता है। आम बोल चाल के शब्दों का आंतरिक धरातल पर कोई अर्थ नहीं होता। वे तो व्यावहारिक रूप से ही अर्थ का अनुराग करते हैं। जब लोग विलक्षण हो जाते हैं तो भाषा भी वैसी ही हो जाती है। आज हम किसी अधकचरे विद्वान को प्रवचन करते सुन सकते हैं के किस प्रकार कोई शब्द अच्छा होता है और कोई बुरा। उदाहरण स्वरूप ‘पक्षपात’ शब्द को हमारा बस चले तो हम शब्दकोश से ही हटा दें। किंतु क्या अच्छाई का पक्षधर होना और बुराई से पक्षपात करना ठीक नहीं? आज हम मात्र अच्छे शब्दों के उपयोग से ही विश्व कल्याण करता चाहते हैं किंतु प्रायः भूल जाते हैं कि शब्द अच्छे तभी तक हैं जब तक वक्ता के विचार भी वैसे ही हों।

आधुनिक निरर्थ

आधुनिक युग की इस विलक्षण भाषा के अनुरूप ही आज के नवयुवक भी होते जा रहे हैं। आज हमें बरगलाने के लिए कई स्वार्थी नेता नए-नए निरर्थक सिद्धांतों से मूर्ख बनाते हैं। कभी नारी उत्थान, तो कभी वर्ण निरपेक्षता और कभी मानवीय एकता के नाम पर अलग-अलग राज नेता और उद्योगपति अपना-अपना उल्लू सीधा करते हैं और नवयुवक बिना किसी समझ के उनके पीछे हो लेते हैं। जहाँ समाज में दया और सामंजस्य होता है, वहाँ ये ढोंगी नेता पुराने धर्म शास्त्रों या फिर लोकप्रिय शब्दों के अर्थ को तोड़-मरोड़ के लोगों को एक दूसरे से लड़ाते हैं। फिर तो कर्म भी वैसे ही हो जाते हैं और समाज व संस्कृति शोषित होने लगती है। तथ्य तो यह है कि शब्दों के अर्थ अच्छे या बुरे तब तक हमें प्रतीत नहीं होते जब तक इनकी सूची हमें न थमा दी जाए। आज के फ़ैशन प्रचारक किसी वस्तु के प्रचार में उसकी विशेषता न बतला कर मात्र यही कहते हैं कि यही नया फ़ैशन है, और लोग मान लेते हैं। उसी प्रकार आज की जनता पुनरुक्तिओं में ही बात-चीत करती है। किसी भी विवाद का न तो कोई औचित्य ही होता है और न कोई दृष्टांत। अगर किसी से पूछा जाए तो बस यही कहता है के ऐसा इस लिए है क्योंकि ऐसा ही है।

विकृत हिंदू धर्म

वर्तमान काल में हिंदू धर्म की सबसे बड़ी समस्या यह है कि जहाँ हमारी बोली में अधिकतम शब्द आज भी संस्कृत से उधार लिये हुए हैं, उन शब्दों के अर्थ का निरर्थ कर दिया गया है। आज हम वर्ण, ब्राह्मणत्व, स्त्री, धर्म तथा रीतियाँ आदि के बारे में जो भी बात करें, हमें रूढ़िवादी होने की श्रेणी में रख दिया जाता है। यह तो सोचने की बात है कि जिस भाषा से हमारा संवाद होता है, अगर उस भाषा ही को हम बुरी दृष्टि से देखेंगे तो बात करने को रह क्या जाएगा? वेद या व्याकरण का तो हमें कोई ज्ञान नहीं, फिर भी हम भाषा के मनोविज्ञानी बने बैठे हैं। उदाहरण के लिये ‘कुण्ठ’ संस्कृत का एक शब्द है जिसका अर्थ है मलीन या आलसी है और इसे किसी के दोषों को अभिमानित करने के लिए किया जाता है। किंतु ‘वि’ उपसर्ग के लगने से यह शब्द ‘वैकुण्ठ’ हो जाता है जिसको हम श्री विष्णु के परम धाम के रूप में जानते हैं। असल में तो वैकुण्ठ को यह संज्ञा इसी लिए दी जाती है कि वह इस माया संसार से परे निष्काम व निष्क्रिय रहता है। पश्चिमी वैज्ञानिक धरातल पर भी देखा जाए तो कथित ‘बिग-बैंग’ के परे जो ब्रह्माण्ड है वह निष्क्रिय ही रहता है। यह तो अलग बात है कि वैज्ञानिक आज तक यह नहीं पता लगा पाये हैं की उस निष्क्रिय व्योम अथवा सागर से विश्व की उत्पत्ति किस कारण अथवा कैसे होती है। अब सोचने की बात तो ये है कि जब हमारे ही धर्म गुरुओं ने हमें बताया की स्वर्ग और नरक लोगों को लुभाने या डराने हेतु बनाए गए हैं और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से काल्पनिक हैं। उन्होंने कहा के हमें इसी जीवन में, इसी पृथ्वी पर स्वर्ग और नरक दोनों ही मिलते हैं और हम जैसा चाहे बना लें।

मुझे तो यह दर्शन हास्यप्रद लगता है, क्योंकि नरक तो दूर, यदि हम इस पृथ्वी को वैकुण्ठ भी बना दें तो हम निष्कृयता से त्रस्त हो जायेंगे और भौतिक शरीर में तो वह वैकुण्ठ भी हमें नरक ही प्रतीक होने लगेगा। किंतु गंभीरता से चिंतन करने पर हमें पता चलेगा की यह सब दोष वास्तविकता में भौतिकवादिओं के विज्ञान का परिणाम है। आध्यात्मिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो ‘महा मृत्युंजय मंत्र’ अमरत्व की आकांक्षा रखते हुए भी हमारा उद्धार करता है और वहीं ‘स्वर्ग यहाँ, नरक यहाँ’ जैसे सिद्धांत हमें भौतिकता की ओर ठेल देते हैं।

सारांश

हिंदूओं को अपने आप को बहुत भाग्यशाली समझना चाहिये कि उनको संस्कृति के धरोहर के रूप में ऐसा वैज्ञानिक धर्म मिला। उनको अन्य धर्मों के परिवर्तनशील सिद्धांतों को देख कर पथ से भ्रमित होने की कोई आवश्यकता नहीं है। उन्हें तो केवल पौराणिक शास्त्रों और वेदों के लुप्त अर्थ तथा उनका ज्ञान खोजने की आवश्यकता है। उन प्रकाश रूप शास्त्रों को बदल कर केवल हानि ही हानि होगी अर्थात्‌ वो शास्त्र तो ज्ञान स्वरूप हैं और आज की ही नहीं बल्कि आने वाली सदियाँ भी उन शास्त्रों के ज्ञान-विज्ञान के आगे न टिक पायेंगी। लोगों को आज गुरु-शिष्य परम्परा का उल्लंघन न करते हुए ज्ञान का विस्तार करना चाहिये। निरर्थक और लोकप्रिय दर्शन जो व्यक्ति के अहंकार मात्र की सेवा में लगे रहते हैं, उनमें न बह कर, हमें तप, पवित्रता, दया और सत्व के साथ दूरगामी विकल्पों पर चिंतन करना चाहिये। यही तो आज के हिंदुत्व की पुकार है।


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