ॐहिंदू धर्म पुरातन है, और पौराणिक धर्मों में एक मात्र है जो आधुनिक काल में जीवित है। आज के धर्म शास्त्रियों और मानव शास्त्रियों की परिभाषा से हम जानते हैं कि ‘होमो सेपिएंस’ (मानव प्रजाती) कम से कम साढ़े तीन लाख साल पुरानी है। आधुनिक मानव भी कम से कम चालीस हज़ार साल पुराने हैं। कृषि का विकास कुछ दस हज़ार साल पहले हुआ और हिंदू धर्म के प्रमाण चार हज़ार साल पुराने प्रतीत होते हैं। इतिहासकारों का कहना है कि एक पुरानीइंडो -यूरोपिअन धर्म ने हिंदू धर्म की नींव रखी थी। उनका मानना है कि एक इंडो-यूरोपिअन सभ्यता, जिसका प्राकट्य मध्य-एशिया में हुआ था, वहां से यूरोप और भारत तक पहुंची। वह सभ्यता अपने साथ उसकी बोली, रीतिआँ और धर्म भी ले आई। बाद में भारत की सभ्यता ने उसी इंडो-यूरोपिअन सभ्यता के आधार पर अपने राज तंत्र और अपनी रीतिआँ निर्धारित कीं और इसी का नाम हिंदू धर्म पड़ा। यह सिद्धांत रोम, भारत और उस समय की दूसरी सभ्यताओं में समानताओं पर आधारित है।

पश्चिमी हिंदुत्व

कथित मान्यता बहुत पुरानी नहीं है। ‘आर्य हस्तक्षेप’ का सिद्धांत तो उन्नीसवीं सदी के पश्चिमी शास्त्रिओं ने ही प्रस्तुत किया था। उससे पहले के पण्डित तो भारतीय सभ्यता को क्षुद्र-बुद्धि और वनवासिओं की श्रेणी में रखते थे। (हास्यप्रद स्थिति तो यह है कि जिस सभ्यता के सकल ब्रह्मचारी, वानप्रस्थी व महानतम तपस्वी एवं ऋषि-मुनि वनवासी हुआ करते थे, आज उसी सभ्यता के लोग वनवासिओं को पिछड़ी जाति का दर्जा देते हैं और महानगरों में रहने को ही अपना औचित्य मानते हैं।) पश्चिमी पण्डितों को न तो संस्कृत का ही ज्ञान था और न तो उनका विज्ञान ही विकसित था। निष्कर्ष स्वरूप उन्होंने भारतीय सभ्यता को पिछड़ा हुआ मान लिया। उससे भी पहले तो उनके पूर्वजों ने कथित काल में भारत में सभ्यता ही नहीं मानी थी। यूरोप के ‘डार्क-एज’ (५०० से १००० ई.पू.) के पश्चात वहाँ के लोगों ने मूर्खता की मिसाल दी। उन्होंने अपने ही वैज्ञानिकों, जिन्होंने पृथ्वी के गोल होने का या सूर्य की परिक्रमा करने का सिद्धांत दिया, उनको शोषित किया। यह तो स्वाभाविक था कि वो भारतीय सभ्यता के बारे में कथित निष्कर्ष का ही अनुग्रह लें।

परंतु जब विज्ञान का विकास हुआ तब हिंदु धर्म के पूर्वानुकूल सिद्धांतों के कारण उसका यश बढ़ा। पुरातत्वेत्ताओं को ४५०० वर्ष पुराने, दूर देशों के साथ भारत के व्यापार के प्रमाण मिले, जिससे भारत में प्राचीन काल से ही महा-राज्यों और वैज्ञानिक उपलब्धिओं का प्रमाण प्रकट हुआ। परिणाम स्वरूप पश्चिमी शास्त्रिओं का घमंड आघातित हुआ और वे ‘आर्य-हस्तक्षेप’ जैसी धारणाओं को विख्यात करने लगे। वे अपनी वरिष्ठता साबित करने के लिये सारे प्रमाणों के विपरीत, अपने सिद्धांतों पर अड़े हैं। वास्तविकता तो यही है कि जहाँ पश्चिमी सिद्धांतों को हर दिन नए प्रमाणों से बदलाव का सामना करना पड़ता है, वहीं सनातन धर्म के सिद्धांत हर दिन अधिक यथार्थ पूर्ण सिद्ध होते हैं।

हिंदू कौन है - आज का हिंदू या भूतकाल का हिंदू?

यद्यपि विभिन्न तथ्य ‘आर्य-हस्तक्षेप’ और ‘अफ्रिका में मानव जाति के सृजन’ जैसे सिद्धांतों को आधारहीन सिद्ध करते हैं, मैं तथ्यों के मल युद्ध में नहीं उतरना चाहता। अगर हम मानवता को सर्वोपरि मानते हैं, तो इस में कोई हानि नहीं है, अगर हम मान लें कि किसी भारतीय के बदले किसी तुर्की ने ही वेदों का संकलन किया। परंतु जिस प्रकार देश उसके नागरिकों से बनता है, न कि भूमि खण्ड से, उसी प्रकार, संस्कृति उसके अनुयायिओं से बनती है। हिंदू धर्म यदि अम्‌रिका में ही क्यों न बना हो, आज तो वहाँ प्रधान नहीं है। और यदि आज किसी अम्‌रीकी को हिंदु धर्म का विश्लेषण करने को कहा जाए तो वो गलत ही होगा। हिंदु धर्म आज भारत में ही जीवित है और यदि किसी और संस्कृति का कोई व्यक्ति इस पर स्वच्छंद अथवा वेदांत के विपरीत टिप्पणी करता है, तो यह इसको निरर्थक तथा पाखण्डी बना देती है।

हमें हिंदु धर्म को वेदांत पद्धति से ही समझना चाहिए। यह अभी संचार में है अथवा जीवित है, तो हमें निर्व्यर्थ इसकी क्या आवश्यकता है कि हम आनुमानिक और काल्पनिक दृष्टि से इसका अध्ययन करें। मैं यह कदापि नहीं कहना चाहता हूं कि हिंदुत्व के बारे में कोई बात ही न करे, किंतु किसी विषय के बारे में विद्वता होने से पहले उसका शिष्य बनना आवश्यक होता है। अतः जिन लोगों ने हिंदू सभ्यता में एक दिन भी न बिताया हो, उन लोगों को पुस्तकालय में बैठ कर उसपर टिप्पणी नहीं करनी चाहिये। हिंदू संस्कृति में जीवन बिताने पर मैं अपने आप को अधिकृत मानने की भूल से उसके बारे में कुछ कहना चाहता हूं।

हिंदुत्व क्या है?

हिंदू धर्म विश्व का सबसे पुराना ही नहीं बल्कि सबसे विविध भी है। अगर विश्व के सारे धर्म एक तरफ़ हों और हिंदुत्व एक तरफ़, तो भी हिंदुत्व ही सर्वाधिक विविध साकार होगा। फिर भी हिंदुत्व से जुड़े सब पंथ आपस में सामन्जस्य रखते हैं और इसी लिये हिंदुत्व ही के क्षत्र में आते हैं। सांख्य वादी, कर्म-काण्डी, नैयायिक, वैषेशिक, वेदांती, वैयाकरणी, भौतिक वादी, भक्ति मार्गी, आर्य समाजी, ज्योतिष वादी, अघोड़ी पंथी इत्यादि कई ऐसे पंथ हैं जिससे हिंदू अलग-अलग दर्शनों का साक्षात्कार करते हैं। आज के धर्म-शास्त्रिओं को यह विविधता भ्रामक लगती है। वे समझ नहीं पाते कि अंततः हिंदुत्व का मूल दर्शन क्या है और कौन सी ऐसी कुंजी है जिसके आधार पर वे हिंदू धर्म को शेष धर्मों के साथ परिभाषित कर सकें।

अंत में कोई उत्तर न मिलने पर वे हिंदुत्व को धर्म का दर्जा देने से विमुख हो जाते हैं और कहने लगते हैं कि हिंदुत्व धर्म नहीं अपितु एक विचार है। वे कहते हैं कि हिंदुत्व अपने अनुयायिओं को कोई भी धारणा रखने के लिये स्वतंत्र छोड़ देता है। प्रतीकात्मक दृष्टि से वे ऐसा हिंदु धर्म की अब्राहमिक धर्मों (यहूदी, ईसाई और इस्लाम) से निर्विशेष गुणों में सराहना हेतु ही करते हैं, परंतु यह भी सत्य तो नहीं ही है। हिंदु धर्म विविध रूप होते हुए भी अपने अनुयायिओं को आधारहीन कोई भी विचार रखने की अनुमति नहीं देता। सत्य विविध नहीं हो सकता है। वास्तविकता में हिंदू धर्म भी दूसरे धर्मों के तरह ही अनुशासन में विश्वास रखता है। जो इसे दूसरे धर्मों से पृथक करता है, वो इसकी सहिष्णुता एवं उदारता है। इस प्रकार, यदि सारे धर्म दूसरे पंथों के प्रति उदार और सहिष्णु हो जाएं तो सभी बिना धर्म परिवर्तित हुए ही हिंदू कहला सकते हैं। यही कारण है कि आज तक विश्व ने हिंदूओं को धर्म परिवर्तन के माध्यम से प्रचार करते नहीं देखा। हिंदुत्व की ऐसी आकांक्षा है ही नहीं।

हिंदुत्व की दृष्टि में धर्म की परिभाषा

यह कहना भी सत्य ही होगा कि हिंदुत्व भी कुछ धर्मों को अपनाने से विमुख हो जाता है। हिंदू शास्त्रों के अनुसार, धर्म को दो प्रकार से विभाजित किया जाता है। एक है सनातन धर्म अर्थात्‌ जो सदा से चला आ रहा है। यह विभाजन उन पंथों की संज्ञा है जो पुरातन हिंदू शास्त्रों को आधारशिला मान कर नींव रखते हैं। सनातनिओं के विचार में धर्म ग्रंथ अकाल नहीं होते। वे दो प्रकार के अनुशासनों में विश्वास करते हैं। एक जो परमेश्वर ने बनाया और जो अकाल प्रवृत्ति का होता है और दूसरा परिवर्तनशील है जिसका संकलन हर द्वापर युग में महर्षि वेद व्यास करते हैं। सनातन धर्म के चार आश्रम हैं: धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष और धर्म रूपी बैल के चार पद हैं: तप, पवित्रता, दया और सत्य।

दूसरा धर्म है, म्लेच्छ धर्म। म्लेच्छ का अर्थ है मलीन अथवा फीका। इसे यह संज्ञा इसके आधारहीन विचारों के लिए मिलती है। इस धर्म के अनुयायी सहजता से धर्म के मूल भावों को बदलते रहते हैं और इसके दर्शन के पीछे कोई वैज्ञानिक तथ्य भी नहीं होता है, अतः अस्पष्ट होता है। हिंदू शस्त्रों में कहा गया है कि कलियुग का प्रादुर्भाव संसार में म्लेच्छ धर्मों के व्यापक होने से ही होगा। इन धर्मों के निराधार दर्शन को कलियुग शोषित करेगा और लोग इसके शिकार हो जाएंगे। प्रत्यक्ष को प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती, और हम देख सकते हैं कि किस प्रकार आधुनिक युग में धर्म के नाम पर पाखण्ड फैल रहा है और दुष्ट लोग धर्म सूत्रों को अपनी स्वार्थ सिद्धि में लगा कर लोगों को झांसा देते हैं। भविष्य पुराण में म्लेच्छ धर्म की विशेषताएं विष्णु भक्ति, अग्नि पूजा, अहिंसा, तपस्या और इंद्रिय दमन बतलाई गयी हैं।

सारांश

आज के स्वार्थी नेता म्लेच्छ धर्म के दर्शनों का उपयोग लोगों को बरगलाने के लिए करते हैं। इनके अनुयायी भी किसी दृढ़ विचार से बंधे न होने के कारण किसी भी दिशा की हवा के साथ बहने लगते हैं। परिणाम स्वरूप म्लेच्छ धर्म की विशेषताएं परिवर्तित हो कर वाम पंथी अथवा रूढ़िवादी, भौतिक वादी, दुर्बल अथवा भीरु, महत्वाकांक्षी और निस्सार हो जाती हैं। इस धर्म के अनुयायिओं को चहिए के वे इस रहस्य को समझें और अनुरूप विकल्प निकालें।

जहाँ तक हिंदुओं की बात है, उनका तात्कालिक उद्देश्य तो ‘परिवर्तन ही संसार का सत्य है’, के नारे से लड़ना ही होना चाहिये। हिंदु धर्म की समस्या उसकी रूढ़िवादी मान्यताएं नहीं बल्कि उसके मूलत्व का शोषण है। परिवर्तन क्या हर स्थिति में आवश्यक है? अगर हम ख़ुश हैं, तो क्या हमें उदास होने के लिये परिवर्तित होना चाहिये? यदि किसी बालक को उसके माता-पिता ने अच्छे संस्कार दे कर उसका अच्छा पालन-पोषण किया है, तो उसको उस पद्धति को बदलने की आवश्यकता नहीं है। उसे तो उसी पालन-पोषण के तरीक़े को अपने बच्चों पर भी उपयोग करना चाहिए। हिंदुओं ने तो पूर्व जन्मो में कुछ अच्छे कर्म ही किए होंगे जो उनका जन्म ऐसी उन्नत और उदार संस्कृति में हुआ। उनका इस जन्म के प्रति तो यही दायित्व बनता है कि वे लोकप्रिय विचारधारा में न बह कर सत्वता के प्रतीक बनें। एक हिंदू को अपने धर्म को आधुनिक युग के अनुरूप परिवर्तित करने की आवश्यकता नहीं है। उसे तो मात्र ऋषि-मुनिओं के सिखाए आश्रमों (धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष) में सामंजस्य स्थापित करने का उद्देश्य ही निर्धारित करना चाहिए।

इस ब्लॉग में मुझे धर्म की परिभाषा देने में ही समय लग गया। मैं अपने अगले ब्लॉग में हिंदुओं की चिंतना के विषय में अधिक कथन करूंगा।


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