भविष्य पुराण के अनुसार, राजा परीक्षित के पौत्र शतानीक ने पौराणिक धर्म और कर्म-काण्ड की दीक्षा सुमंतु मुनि से ली थी। उन दोनों के संवाद में निम्नलिखित कथा गणेश जी के विघ्न विनायक होने की कथा है।

राजा शतानीक ने पूछा – मुने! गणेश जी ने किसके लिये विघ्न उत्पन्न किया था, जिसके लिये उन्हें विघ्न विनायक कहा गया। आप विघ्नेश तथा उनके द्वारा विघ्न उत्पन्न करने के कारण को मुझे बताने का कष्ट करें।

सुमंतु मुनि बोले – राजन्‌! एक बार अपने लक्षण-शास्त्र के अनुसार स्वामिकार्तिकेय ने पुरुषों और स्त्रियों के श्रेष्ठ लक्षणों की रचना की, उस समय गणेश जी ने विघ्न किया। इस पर कार्तिकेय क्रुद्ध हो उठे और उन्होंने गणेश का एक दाँत उखाड़ लिया और उन्हें मारने के लिये उद्यत हो उठे। उस समय भगवान्‌ शंकर ने उनको रोक कर पूछा कि तुम्हारे क्रोध का क्या कारण है?

कथा क्र. १

कार्तिकेय ने कहा – पिता जी ! मैं पुरुषों के लक्षण बना कर स्त्रियों के लक्षण बना रहा था, उस में इसने विघ्न किया, जिससे स्त्रियों के लक्षण मैं नहीं बना सका। इस कारण मुझे क्रोध हो आया। यह सुन कर महादेव जी ने कार्तिकेय के क्रोध को शांत किया और हँसते हुए उनसे पूछा।

शंकर बोले – पुत्र! तुम पुरुष के लक्षण जानते हो तो बताओ, मुझमें पुरुष के कौन से लक्षण हैं?

कार्तिकेय ने कहा – महाराज! आपमें ऐसा लक्षण है कि संसार में आप कपाली के नाम से प्रसिद्ध होंगे। पुत्र का यह वचन सुन कर महादेव जी को क्रोध हो आया और उन्होंने उनके उस लक्षण-ग्रंथ को उठा कर समुद्र में फेंक दिया और स्वयं अंतर्ध्यान हो गए।

बाद में शिव जी ने समुद्र को बुला कर कहा कि तुम स्त्रियों के आभूषण-स्वरूप विलक्षण लक्षणों की रचना करो कार्तिकेय ने जो पुरुष-लक्षण के विषय में कहा है उसको कहो।

समुद्र ने कहा – जो मेरे द्वारा पुरुष लक्षण का शास्त्र कहा जाएगा, वह मेरे ही नाम ‘सामुद्रिक शास्त्र’ से प्रसिद्ध होगा। स्वामिन्‌! आपने जो आज्ञा मुझे दी है, वह निश्चित ही पूरी होगी।

शंकर जी ने पुनः कहा – कार्तिकेय! इस समय जो तुमने गणेश का दाँत उखाड़ लिया है उसे दे दो। निश्चय ही जो कुछ यह हुआ है, होना ही था। दैवयोग से यह गणेश के बिना संभव नहीं था, इस लिए उनके द्वारा यह विघ्न उपस्थित किया गया। यदि तुम्हें लक्षण की अपेक्षा हो तो समुद्र से ग्रहण कर लो, किंतु स्त्री-पुरुषों का यह श्रेष्ठ लक्षण-शास्त्र ‘सामुद्र-शास्त्र’ इस नाम से ही प्रसिद्ध होगा। गणेश को तुम दाँत-युक्त कर दो।

कार्तिकेय ने भगवान देवदेवेश्वर से कहा – आपके कहने से मैं दाँत तो विनायक के हाथ में दे देता हूं, किंतु इन्हें इस दाँत को सदैव धारण करना पड़ेगा। यदि इस दाँत तो फेंक कर ये इधर-उधर घूमेंगे तो यह फेंका गया दाँत इन्हें भस्म कर देगा। ऐसा कह कर कार्तिकेय ने उनके हाथ में दाँत दे दिया। भगवान देवदेवेश्वर ने गणेश को कार्तिकेय की इस बात को मानने के लिये सहमत कर लिया।

सुमंतु मुनि की टिप्पणी

सुमंतु मुनि ने कहा – राजन! आज भी भगवान शंकर के पुत्र विघ्नकर्ता महात्मा विनायक की प्रतिमा हाथ में दाँत लिये देखी जा सकती है। देवताओं की यह रहस्यपूर्ण बात मैंने आपसे कही। इसको देवता भी नहीं जान पाये थे। पृथ्वी पर इस रहस्य को जानना तो दुर्लभ ही है। प्रसन्न हो कर मैंने इस रहस्य को आपसे तो कह दिया है, किंतु गणेश जी की यह अमृत कथा चतुर्थी तिथि के संयोग पर ही कहनी चाहिये। जो विद्वान हो, उसे चाहिये कि वो इस कथा को वेद पारंगत श्रेष्ठ द्विजों, अपनी क्षत्रियोचित वृत्ति में लगे हुए क्षत्रियों, वैश्यों और गुणवान शूद्रों को सुनायें। जो इस चतुर्थी व्रत का पालन करता है, उसके लिये इस लोक तथा पर लोक में कुछ भी दुर्लभ नहीं रहता। उसकी दुर्गति नहीं होती और न कहीं वो पराजित होता है। भरत श्रेष्ठ! निर्विघ्न-रूप से वह सभी कार्यों को सम्पन्न कर लेता है, इसमें संदेह नहीं है। उसे ऋद्धि-व्रिद्धि-ऐश्वर्य भी प्राप्त हो जाता है।

कथा क्र. २

राजा शतानीक ने सुमंतु मुनि से पूछा – विप्रवर! गणेशजी को गणों का राजा किसने बनाया और बड़े भाई कार्तिकेय के रहते हुए ये कैसे विघ्नों के अधिकारी हो गये?

सुमंतु मुनि ने कहा – राजन! आपने बहुत अच्छी बात पूछी है। जिस कारण ये विघ्नकारक हुए हैं और जिन विघ्नों को करने से इस पद पर इनकी नियुक्ति हुई वह मैं कह रहा हूँ, उसे आप एकाग्रचित्त हो कर सुनें। पहले कृत युग में प्रजाओं की जब सृष्टि हुई तो बिन विघ्न-बाधा के देखते-ही-देखते सब कार्य सिद्ध हो जाते थे। अतः प्रजा को बहुत अहंकार हो गया। क्लेश-रहित एवं अहंकार से परिपूर्ण प्रजा को देख कर ब्रह्मा ने बहुत सोच-विचार कर के प्रजा-समृद्धि के लिये विनायक को विनियोजित किया। अतः ब्रह्मा के प्रयास से भगवान शंकर ने गणेश को उत्पन्न किया और उन्हें गणों का अधिपति बनाया।

राजन! जो प्राणी गणेश की बिना पूजा किए ही कार्य आरम्भ करता है, उनके लक्षण मुझसे सुनिये – वह व्यक्ति स्वप्न में अत्यंत गहरे जल में अपने को डूबते, स्नान करते हुए या केश मुड़ाये देखता है। काषाय वस्त्र से आच्छादित तथा हिंसक व्याघ्र आदि पशुओं पर अपने को चढ़ता हुआ देखता है। अंत्यज, गर्दभ तथा ऊँट आदि पर चढ़ कर परिजनों से घिरा हुआ अपने को जाता हुआ देखता है। जो मानव केकड़े पर बैठ कर अपने को जल की तरंगों के बीच गया हुआ देखता है और पैदल चल रहे लोगों से घिर कर यमराज के लोक को जाता हुआ अपने को स्वप्न में देखता है, वह निश्चित ही अत्यंत दुखी होता है।

जो राजकुमार स्वप्न में अपने चित्त तथा आकृति को विकृत रूप में अवस्थित करवीर के फूलों की माला से विभूषित देखता है, वह उन भगवान विघ्नेश के द्वारा विघ्न उत्पन्न कर देने के कारण पूर्व वंशानुगत प्राप्त राज्य को प्राप्त नहीं कर पाता। कुमारी कन्या अपने अनुरूप पति को नहीं प्राप्त कर पाती। गर्भिणी स्त्री सन्तान को नहीं प्राप्त कर पाती है। श्रोत्रिय ब्राह्मण आचार्यत्व का लाभ नहीं प्राप्त कर पाता और शिष्य अध्ययन नहीं कर पाता। वैश्य को व्यापार में लाभ नहीं प्राप्त होता है और कृषक को कृषि-कार्य में पूरी सफलता नहीं मिलती। इस लिये राजन! ऐसे अशुभ स्वप्नों को देखने पर भगवान गणपति की प्रसन्नता के लिये विनायक-शांति करनी चाहिये।

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श्रेणी: कथाएँ

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