ॐयह तो हम सब जानते हैं कि हिंदू विभिन्न प्रकार के देवों की पूजा करते हैं। किंतु हम उस परमेश्वर में भी विश्वास रखते हैं जो सारी सृष्टि का परम धाम है। आधुनिक युग में जानकारियों की बाढ़ के कारण, प्रायः ही हम सबसे स्थूल किंतु सबसे आवश्यक ज्ञान को भूल जाते हैं – वह ज्ञान जो हमारी जीवन शैली को घोर रूप से प्रभावित कर सकता है। भगवत्‌-पुराण का यह वाच्य भगवान की परम व्याख्या उनके सबसे स्थूल और विराट रूप में करता है। अर्जुन पौत्र राजा परीक्षित से संवाद करते हुए महामुनि श्री शुकदेव जी बतलाते हैं कि किस प्रकार भगवान के स्थूल रूप की धारणा और ध्यान मनुष्य को भक्ति योग की प्राप्ति करा सकता है।

ध्यान विधि

श्री शुकदेव जी ने कहा - मनुष्य को चाहिये कि वह वैराग्य के शस्त्र से शरीर और उससे सम्बन्ध रखने वालों के प्रति ममता को काट डाले। धैर्य के साथ घर से निकल कर पवित्र तीर्थ के जल में स्नान करे और पवित्र तथा एकांत स्थान में विधि पूर्वक आसन लगा कर बैठ जाए। तत्पश्चात परम पवित्र ‘अ, उ, म्‌’ इन तीन मात्राओं से युक्त प्रणव का मन ही मन जप करे। प्राण वायु को वश में कर के मन का दमन करे और एक क्षण के लिये भी प्रणव को न भूले। बुद्धि की सहायता से मन के द्वारा इंद्रियों को उनके विषयों से हटा ले। और कर्म की वासनाओं से चंचल हुए मन को विचार के द्वारा रोक कर भगवान के मंगलमय रूप में लगाए। स्थिर चित्त से भगवान के श्री विग्रह में से किसी एक अंग का ध्यान करे। इस प्रकार एक-एक अंग का ध्यान करते-करते विषय-वासना से रहित मन को पूर्ण रूप से भगवान में ऐसा तल्लीन कर दे कि फिर और किसी विषय का चिंतन ही न हो। वही भगवान विष्णु का परम पद है, जिसे प्राप्त कर के भगवत्‌-प्रेम-रूप आनंद से भर जाता है। यदि भगवान का ध्यान करते समय मन रजोगुण से विक्षिप्त या तमोगुण से मूढ़ हो जाए तो घबराये नहीं। धैर्य के साथ योग धारणा के द्वारा उसे वश में करना चाहिये; क्योंकि धारणा उक्त दोनों गुणों के दोषों को मिटा देती है। धारणा स्थिर हो जाने पर ध्यान में जब योगी अपने परम मंगलमय आश्रय (भगवान) को देखता है, तब उसे तुरंत ही भक्ति योग की प्राप्ति हो जाती है।

धारणा का महात्म्य

परीक्षित ने पूछा – ब्रह्मण! धारणा किस साधन से किस वस्तु में किस प्रकार की जाती है और उसका क्या स्वरूप माना गया है, जो शीघ्र ही मनुष्य के मन का मैल मिटा देती है?

श्री शुकदेव जी ने कहा – परीक्षित! आसन, श्वास, आसक्ति और इंद्रियों पर विजय प्राप्त कर के फिर बुद्धि के द्वारा मन को भगवान के स्थूल रूप में लगाना चाहिये। यह कार्य रूप सम्पूर्ण विश्व जो कुछ कभी था, है या होगा – सब का सब जिसमें दिख पड़ता है, वही भगवान का स्थूल से स्थूल और विराट शरीर है। जल, अग्नि, वायु, आकाश, अहंकार, महत्तत्व और प्रकृति – इन सात आवरणों से घिरे हुए इस ब्रह्माण्ड शरीर में जो विराट पुरुष भगवान हैं, वे ही धारणा के आश्रय हैं, उन्हीं की धारणा की जाती है।

भगवान का विराट रूप

तत्वज्ञ पुरुष उनका इस प्रकार वर्णन करते हैं – पाताल विराट पुरुष के तलवे हैं, उनकी एड़ियाँ और पंजे रसातल हैं, दोनों गुल्फ – एड़ी के ऊपर की गाँठें महातल हैं, उनके पैर के पिंडे तलातल हैं। विश्व मूर्ति भगवान के दोनों घुटने सुतल हैं, जाँघें वितल और अतल हैं, पेडू भूतल हैं, और परीक्षित! उनके नाभि रूप सरोवर को ही आकाश कहते हैं। आदि पुरुष परमात्मा की छाती को स्वर्गलोक, गले को महर्लोक, मुख को जन लोक, और ललाट को तपोलोक कहते हैं। उन सहस्त्र सिर वाले भगवान का मस्तक समूह ही सत्यलोक है।

इंद्रादि देवता उनकी भुजाएँ हैं, दिशाएँ कान और शब्द श्रवणेंद्रिय हैं। दोनों अश्विनिकुमार उनकी नासिका के छिद्र हैं; गन्ध घ्राणेंद्रिय है, और धधकती हुई आग उनका मुख है। भगवान विष्णु के नेत्र अंतरिक्ष हैं, उनमें देखने की शक्ति सूर्य है, दोनों पलकें रात और दिन हैं, उनका भ्रूविलास ब्रह्मलोक है। तालु जल है और जिह्वा रस। वेदों को भगवान का ब्रह्मरन्ध्र कहते हैं, यम को दाढ़ें,। सब प्रकार के स्नेह दाँत हैं और उनकी जगन्मोहिनी माया को ही उनकी मुस्कान कहते हैं। यह अनंत सृष्टि उसी माया का कटाक्ष-विक्षेप है। लज्जा ऊपर का ओठ और लोभ नीचे का ओठ है। धर्म स्तन और अधर्म पीठ है। प्रजापति उनके मूत्रेन्द्रिय हैं, मित्रावरुण अणडकोश हैं, समुद्र कोख है और बड़े-बड़े पर्वत उनकी हड्डियाँ हैं। राजन! विश्व मूर्ति विराट पुरुष की नाड़ियाँ नदियाँ हैं। वृक्ष रोम हैं। परम प्रबल वायु श्वास है। काल उनकी चाल है और गुणों का चक्कर चलाते रहना ही उनका कर्म है।

परीक्षित! बादलों को उनके केश मानते हैं। संध्या उन अनंत का वस्त्र है। महात्माओं ने अव्यक्त (मूल प्रकृति) को ही उनका हृदय बतलाया है और विकारों का खज़ाना उनका मन चंद्रमा कहा गया है। महत्तत्व को सर्वात्मा भगवान का चित्त कहते हैं और रुद्र उनके अहंकार कहे गये हैं। घोड़े, खच्चर, ऊँट और हाथी उनके नख हैं। वन में रहने वाले सारे मृग और पशु उनके कटि प्रदेश में स्थित हैं। तरह-तरह के पक्षी उनके अद्भुत रचना कौशल हैं। स्वायम्भुव मनु उनकी बुद्धि हैं मनु की संतान मनुष्य उनके निवास स्थान हैं। गन्धर्व, विद्याधर, चारण और अप्सराएँ उनके षड्ज आदि स्वरों की स्मृति हैं। दैत्य उनके वीर्य हैं। ब्राह्मण मुख, क्षत्रिय भुजाएँ, वैश्य जंघाएँ और शूद्र उन विराट पुरुष के चरण हैं। विविध देवताओं के नाम से जो बड़े-बड़े द्रव्यमय यज्ञ किए जाते हैं, वे उनके कर्म हैं।

परीक्षित! विराट भगवान के स्थूल शरीर का यही स्वरूप है, सो मैंने तुम्हें सुना दिया। इसी में मुमुक्षु पुरुष बुद्धि के द्वारा मन को स्थित करते हैं; क्योंकि इससे भिन्न और कोई वस्तु नहीं है। जैसे स्वप्न देखने वाला स्वप्नावस्था में अपने आप को ही विविध पदार्थों के रूप में देखता है, वैसे ही बुद्धि-वृत्तियों के द्वारा सब कुछ अनुभव करने वाला सर्वांतरयामी परमात्मा भी एक ही हैं। उन सत्य स्वरूप आनंद निधि भगवान का ही भजन करना चाहिये, अन्य किसी भी वस्तु में आसक्ति नहीं करनी चाहिये। क्योंकि यह आसक्ति जीव के अधःपतन का हेतु है।

सनातन धर्म के अन्य सांस्कृतिक तथ्य के बारे में जानने के लिये यहाँ क्लिक करें। अथवा सनातन धर्म के बारे में अधिक जानने के लिये यहाँ क्लिक करें


0 टिप्पणियाँ

प्रत्युत्तर दें