पिछले ब्लॉग में मैंने यह स्थापित करने का प्रयत्न किया था कि किस प्रकार धर्म के धाता पथ भ्रष्ट होने के कारण धर्म को ऐसे मार्ग पर ले गये कि लोगों की आस्था ही नष्ट हो गयी। हम इस दुर्भाव को आज के नास्तिकों या भौतिक वादी उद्योगपतियों पर भी लांछित नहीं कर सकते। जब कि अनात्मवाद और भोगवाद इस संसार को एक करने के प्रयास में लगा है, धर्म और दर्शन पृथक हो लोगों को विभाजित कर रहे हैं। परिणाम स्वरूप आज लोग धर्म को निरर्थक और अप्रयोगात्मक मानते हैं। धर्म तो आज सभ्यता के प्रति तदीयत्व अथवा मनोरंजन मात्र का हेतु ही बन कर रह गया है। लोग बिना किसी आस्था के ही पूरा जीवन व्यसन करते हैं एतावता जीवन न्यास के मान बिंदुओं पर उनकी कोई राय नहीं होती। जो कोई भी कुछ नई पद्धति सुझाये वही आश्रम अपना लेते हैं। वे भ्रष्ट मार्ग दर्शकों के द्वारा शोषित होने के लिये सनमुख हो जाते हैं और गणतंत्रता अपना मायना खो बैठती है।

हिंदू दर्शन के अनुसार अनेकों जन्मो से आत्मा, शरीर रूपी वस्त्रों को बदलती रहती है। किंतु आज तो लोग एक ही जन्म में विचारों और अभिन्युक्तिओं को भी बदलते रहते हैं। जन्म-जन्मांतर पर स्मरण-शक्ति का विलोप होने से हम जीवन चक्र में फँसे रह जाते हैं, किंतु यदि हम एक ही जन्म में ऐसा करेंगे तो भगवान ही जाने हमारा अध्यात्मिक उत्थान किस प्रकार होगा। प्रयोगात्मक दृष्टि से भी जब सारे विश्व में गणतंत्र ही बहुत्ता में है, तब तो यह क्रिया और भी विषैली हो जाती है। यह तो विचारणीय है कि भला किस प्रकार एक पृथक समाज किसी देश या कि विश्व की नीतियों का चुनाव कर सकता है। कथित कोलाहल एवं विकलता के समय कोई भ्रष्ट राजनेता या कोई उद्योगपति जनता को झूठी आशा से बांध लेता है और अपनी स्वार्थ सिद्धि करता है। वो लोगों को और भी दुख में ठेल देता है और उनकी पीड़ा से उन पर आधिपत्य स्थापित कर लेता है।

कलियुग – वर्तमान स्थिति

उपरोक्त कथन को मानने के लिये हमें किसी सांख्यिकीय पत्र की आवश्यकता नहीं है। हम आये दिन देख सकते हैं कि ज्ञान के अभाव में किस प्रकार लोग विपरीत चुनाव करते हैं और दुख का आवाहन करते हैं। अज्ञानी लोग वस्तु स्थिति के तथ्य को नहीं समझ पाते और बिना तथ्य ज्ञान के कोई भी वास्तविक निर्णय निरर्थक ही सिद्ध होता है। बहुत से लोग जो समझ सकते हैं, कुछ करना नहीं चाहते और जो करना चाहते वे पहले के दो गुटों से पराजित हो निष्फल हो जाते हैं। जो थोड़े बहुत लोग सफल भी होते हैं तो उनका संयोग लघुजीवी ही होता है।

यह तो अकाट्य है कि आज की नई पीढ़ियाँ कुछ समय पूर्व के लोगों अधिक संवेदनशील हैं। अगर हम आशावादी हो कर सोचें तो आज कई गुटों के लोग जातिवाद, एकाधिकारवाद, प्रकृति के शोषण आदि के समक्ष लड़ रहे हैं। किंतु प्रश्न तो यह उठता है कि क्या उनके नेता उनका सही मार्गदर्शन कर रहे हैं? यदि हम इस वाद-विवाद रूपी सागर के उपलक्ष रूपी तल में उतरें तो हमें धर्म के पक्षपात और राजकीय तथा अंतर्राष्ट्रीय नीतियाँ ही मिलेंगी। जहाँ कि धर्म और दर्शन को ताखे पर रख दिया जाता है, वहीं तकनीकी शब्दजाल में लोगों को व्यस्त रख कर उन्हें वस्तु स्थिति का सार निकालने को कहा जाता है। उपमा स्वरूप जब हमारी नाव डूब रही है, हम आकाश में छिद्र ढूंढ रहे हैं।

धर्म बनाम नास्तिकता

आज हम किसी भी नास्तिक को किसी धर्मानुचारी से वाद-विवाद करते देखेंगे तो हमें एक ही भाव दिखेगा। साधारण रूप से नास्तिक व्यक्ति भौतिक विज्ञान के प्रचारक होते हैं और हम पायेंगे कि एक वैज्ञानिक हर मान बिंदु पर धर्म को पराजित कर देता है। कारण यह है कि धर्म को मात्र आस्तिकता ही नहीं बल्कि दूसरे धर्मों से भी लड़ना होता है। नास्तिक लोग प्रायः इसी दुर्बलता का उपयोग कर के धर्मानुचारिओं को पराजित कर देते हैं। वहीं दूसरी तरफ़ विज्ञान के सारे अधकचरे सिद्धांत तथ्य रूपी समझे जाते हैं। हास्यप्रद बात तो यह है कि आज अपनी उपलब्धता में नास्तिकों को धर्मियों से अधिक आस्था है।

उदाहरण स्वरूप, कोई भी वैज्ञानिक, विज्ञान की हर विद्या का वक्ता माना जाता है और कोई दूसरा वैज्ञानिक ऐसा करने के लिये उसको लांछित नहीं करता। किंतु क्या मज़ाल कि किसी एक धर्म का व्यक्ति जो किसी दूसरे धर्म पर टिप्पणी कर दे! और यह भी तो सच ही है कि भला कौन दूसरे धर्म की उपलब्धियों का मूल्यांकन करता है। सब तो बस कीचड़ ही उछालने में लगे हैं। परिणाम यह है कि जहाँ भौतिक विज्ञान के सारे सिद्धांत, जैसे कि ‘बिग-बैंग’, ‘निरंतर ब्रह्माण्ड’, ‘बहुआयामी ब्रह्माण्ड’, ‘चक्रीय ब्रह्माण्ड’ इत्यादि सब अंतर्विरोधी हैं, वह फिर भी अब्राहमी धर्मों के अवैज्ञानिक शास्त्रों का मखौल उड़ाता है। और जहाँ प्रगति के नाम पर विज्ञान पद्धतियाँ सारे पर्यावरण को दूषित कर जीवन ही का अंत करने पर जुटीं हैं, वे हिंदुत्व के वहनीय अथवा दीर्घकालिक प्रथाओं को जातिवाद के लांछन से निष्फल कर देता है।

धर्म से विविधता का विस्तार

अब प्रश्न उठता है कि क्या हमें सारे धर्मों में आस्था होनी चाहिये? और यह भी कैसे पता लगे कि किस धर्म की कौन सी रीतियों को हम अपनायें?

उत्तर है कि धर्म निरपेक्षता नास्तिकता ही के समान तो है। एकता का संकल्प तो तभी सम्भव हो सकता है जब पूर्वानुकृत अनेकता हो। यथार्थ रूप में आज अगर समाज पृथक हो गया है तो इसका कारण यही है कि उपभोक्तावाद और भौतिकवाद ने संसार को एक समान रूप में ढाल दिया है। धर्म ही एक मात्र पथ है जिस पर हम भिन्न रंगों में रंगे हुए भी एकता के संकल्प के साथ जीते हैं। हम कोई भी धर्म अपनायें, किंतु हमें दूसरे धर्मों के प्रति आदर का भाव रखना चाहिये। अगर मैं एक हिंदू हूँ तो क़ुरान या बाइबल पढ़ लेने से मेरा धर्म भ्रष्ट नहीं हो जाता। किंतु यह भी सच है कि एक समाज या एक राष्ट्र धर्म निरपेक्ष हो सकता है, एक व्यक्ति नहीं। हमें अंत में अपनी आस्था एक ही परमेश्वर जो सत्‌-चित्‌-आनंद हों उनमें उपलक्षित करनी चाहिये।

विश्व के पुरातन धर्म का संदेश

भारत में हिंदुओं की बहुत्ता है परंतु उसने सभी धर्मों का सन्निवेश किया है। मैं अपने को पक्षपाती नहीं मानता और इसी अधिकार से कहना चाहता हूँ कि मुसलमान पहले तो भारत में व्यावसायिक तौर पर आये और बाद में राज भी किया। अगर हम इतिहास को देखें तो हमें पता चलेगा कि कितने ही हिंदू संत जो कि अपनी आस्था के पक्के थे, उन्होंने बिना किसी दुर्विचार से मुहम्मद साहिब की जीवनी लिखी है। भविष्य पुराण जैसे मूल हिंदू ग्रन्थ भी मूसा, ईसा और मुहम्मद को गुरुओं और मसीहों की उपाधि देते हैं, और साथ ही सनातन धर्म की प्रधानता भी सिद्ध करते हैं। किसी भी धर्म पुरुष को हिंदुओं ने कभी नास्तिक या क़ाफिर की उपाधि नहीं दी। हिंदुओं ने बुद्ध और जैन धर्मों को तो समझो कि अपना ही लिया है। भारत में जो भी धर्म या दर्शन आये, उसने उनको दोनों हाथों से अपनाया और फिर भी यहाँ हिंदुओं की ही बहुत्ता रही। यह दूसरे धर्मों को जो परिवर्तन करवाने में लगे रहते हैं, उनको सीखना चाहिये।

हाँ में यह मानता हूँ कि पिछले कुछ समय से हिंदुत्व के नाम पर बहुत आतताएं हो रहीं हैं जिनका संवैधानिक न्याय अराजक तत्वों के प्रत्योत्तर के रूप में ठहराया जा सकता है। परन्तु मैं यह कतैव ही नहीं कहना चाहूँगा और मैं इस हिंसा की आलोचना करता हूँ। वास्तविकता में तो यह हिंदू मान बिंदुओं पर किया हुआ कार्य भी नहीं था। ये तो केवल राजतंत्र और अराजक तत्वों का फैलाया एक नया झूठ था जिसकी व्याख्या करते-करते मैंने यह सब लिख दिया। हिंदुत्व तो सहिष्णुता की मूर्ति है। अगर हम हिंदुओं का असली रूप देखना चाहते हैं तो हमें शंकराचार्य पद्धति के संतों और गुरुओं की ओर मुख करना चाहिये। वहाँ हम पायेंगे कि कोई भड़काऊ बात या हिंसाप्रद कथन नहीं बल्कि शांतिपूर्वक संवाद और धर्म उपदेश की ही बातें होतीं हैं।

सारांश

इन सब बातों के मूल में जो विचार है वह यह है कि आज के धर्मचारी गुरु पाखण्डी हो गये हैं। यदि कोई मुल्ला अपने धर्म के लोगों से कहता है कि वे आज के ढोंगी रिवाज़ों में न बह कर क़ुरान शरीफ़ की पुरातन रीतिओं को अपनाये और फिर वो उससे भी पुराने ईसाई धर्म को पाखण्डी बतलाता है तो सर्वथा वो आप ही पाखण्डी सिद्ध होता है। हमें नहीं भूलना चाहिये कि हम सत्वता को तभी साकार कर सकते हैं जब हम भाषा और कर्म में समानता रखें। धर्म तो सिद्ध तभी होगा जब मुसलमान ईसाइओं का आदर करें, ईसाई यहूदिओं का, यहूदी पारसिओं का, पारसी हिंदुओं का और समभाव से हिंदू अन्य सभी धर्मों का आदर करें।


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