ॐआधुनिक युग में भी धर्म, अध्यात्म और संस्कृति पर चर्चा आम है। कारण यह है कि नव युवक यह समझते हैं कि यह सब एक समय में बहुत उपयोगी थे किंतु अब इनका महत्व लोप हो रहा है। आज हम इन मान्यताओं को नहीं अपनाते क्योंकि हम समझते हैं कि ये बनावटी अथवा मिथ्या हैं और हमारे जीवन में इनकी उपयोगिता नहीं रही। साथ ही हम भूल भी नहीं पाते कि हमारे पूर्वजों के लिये ये रीतियाँ इतनी आवश्यक क्यों थीं और कदाचित यह कोई आवश्यक रहस्य तो नहीं छिपाये हैं। दो शब्द – ‘आस्था’ और ‘भक्ति’ जो धर्म और अध्यात्म में उपयोग किए जाते हैं, आज महात्म्य खो रहे हैं। आस्था तो फिर भी अपना स्थान ढूंढ लेता है, किंतु भक्ति का विक्षेप हो गया है।

आधुनिक अधकचरा संसार

आधुनिक युग को आए दिन इस असमंजस का सामना करना पड़ता है कि वो किस आस्था का अनुसरण करे। क्या आस्था सही है? क्या हमें अध्यात्म या फिर भौतिकवाद में आस्था रखनी चाहिये? क्या ज्ञान ही सब कुछ ही है? वास्तविकता में हमने प्रौद्योगिकी और महा-यंत्रों का ऐसा नृत्य देखा है कि पुरातन साहित्य और दृष्टांत हमारे लिये अर्थ खो चुके हैं। हम आज परिवर्तन ही को अकाट्य सत्य मान चुके हैं और यह भूल गये हैं के कुछ चीज़ें कभी नहीं बदलतीं। यद्यपि हम जानते हैं कि उद्भव (इवोल्यूशन) हज़ारों वर्षों के समय में होता है, फिर भी हम इस भ्रम से उदित नहीं हो पाते कि किस प्रकार हम कुछ ही वर्ष पहले के अपने पूर्वजों से सम्पूर्णतः भिन्न हो गये हैं।

हमारा विचार आज अपनी संस्कृति को बिल्कुल नए विचारों से रंग कर और पुराने सारे विचारों का दमन कर के चलाने का है। परिणाम स्वरूप हम आज अपने ही पूर्वजों की हर बात को असत्य सिद्ध करने में प्रयत्नशील रहते हैं। अधकचरी उम्र में बेचैन बालक के तरह हम विद्रोह ही को जीवन का साधन मानते हैं। हमने बहुत से कारणों की खोज में अपना समय बिताया है जिससे हम अन्योन्य वस्तुओं में आस्था नहीं रखने के उत्तर पा सकें। उदाहरण स्वरूप हमें भगवान में आस्था नहीं है। हमें रूढ़िवादी और पाखण्डी अनुचरनों में आस्था नहीं है। हमें निरर्थक रीतिओं अथवा मिथ्या में भी आस्था नहीं है। आस्था को नकारने के और कई उदाहरण हैं किंतु तथ्य यह कि हमें भक्ति उस वस्तु-भेद में नहीं हो सकती जिस में हमें आस्था नहीं है।

आस्था में भक्ति

प्रश्न यह है कि क्यों भक्ति का विलोप होता जा रहा है किंतु आस्था सुरक्षित है? उत्तर स्पष्ट है। बिना आस्था के कोई व्यक्ति अपने जीवन काल का एक क्षण भी बिना पागल हुए नहीं काट सकता। किसी भी क्रिया का कर्ता होने के लिये हमें कुछ तो आस्था रखनी ही होती है। हम भगवान या फिर मानवता में आस्था रख सकते हैं। या फिर जीवन, मरण, प्रकृति, ब्रह्माण्ड रूप परमेश्वर, भौतिकवाद अथवा अधर्म ही को क्यों न माने किंतु कुछ न कुछ तो मानना ही पड़ता है। क्योंकि सर्वस्व अनास्था तो जीवन की सत्वता ही में अनास्था हो जाएगी और फिर हम किसी भी कार्य से विमुख हो अथवा स्तब्ध हो शीघ्र ही जीवन त्यागने पर विवश हो जाएंगे।

किंतु भक्ति का हमारे जीवन में क्या उद्देश्य है? वह कितनी आवश्यक है? उत्तर यह है किसी व्यक्ति को भक्ति केवल उसी वस्तु या विचार में हो सकती है जिसमें उसकी आस्था किसी ठोस आधार पर यानी तथ्य, विज्ञान तथा दर्शन आदि के मान बिंदुओं पर आधारित हो। भक्ति नाम की उति जीवन का स्वभाव नहीं है बल्कि वह बुद्धि से उदित होती है। अतः हम यदि भगवान में आस्था रखें और हमें यह विश्वास हो कि धर्म का मार्ग ही सत्य है तो हमें भगवान में भक्ति होगी। किंतु यदि हम अधर्म ही को अपने जीवन की आस्था बनायें और हमारा मन यह कहता रहे कि अधर्म असत्य है, तो हमें अधर्म में भक्ति कतैव भी न होगी। जीवन और ज्ञान के इस सात्विक स्वभाव का परिणाम यह है कि सत्य भले ही काल भर अज्ञान के अंधकार में क्यों न रहे, सत्य रहता है और असत्य अपने आप को विजयी देख कर भी पाखण्ड का ही अनुभव करता है। यही तो मानवता की प्रशंसा है जो हम सब को सर्वदा सत्य की ओर ढकेलती है। चाहे कितने हम जितने भी पाप क्यों न कर लें, हमारे भीतर मानवता सदैव जीवित रहती है और पश्चाताप सर्वदा ही एक विकल्प रहता है।

आज भक्ति का विलोप जिस कारण से हो रहा है वह यह है कि आधुनिक युग में प्रगति के नाम पर मात्र प्रौद्योगिकी और विज्ञान ही आगे बढ़ रहा है। कला और साहित्य का दमन किया जाता है। हमने अपनी शब्दावली भी भौतिकता और सांख्य के पास धरोहर रख दी है। किंतु भौतिकता और मानवता का स्नेह अधिकतम प्रलय तक ही हमारे साथ है और विज्ञान तो हर दिन परिवर्तन की मार झेलता है। इन वस्तुओं में आस्था हमें भय और पीड़ा के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं दे सकती हैं। और यदि हम अपनी ही आस्था के जीवात्मक निश्चय पर संदेह करने लग जायेंगे, तब हमें भक्ति का अनुभव तो कदापि नहीं हो सकता। अंततः बिना भक्ति के मार्ग दर्शन के हमारी निराधार आस्था का बोझ हमें कुंठित कर देता है और हम सुख और चैन दोनों ही गंवा बैठते हैं।

प्राकृतिक संतुलन

हर मनुष्य को यह आभास होता है कि उसमें कुछ ऐसी अव्यक्त शक्ति है जिसे संसार के सारे गणितज्ञ और वैज्ञानिक भी नहीं प्रकट कर सकते। इस भाव को हम मनोविज्ञान का आध्यात्मिक खण्ड मानते हैं। यह भाव हमारे सुख और मानसिक संतुलन को बनाये रखने के लिये अति आवश्यक होता है। कई बार प्रतीकात्मक वस्तु हमारे अध्यात्म से विपरीत तथ्य प्रकट करती हैं और प्रमाण रूप में हम भौतिकवाद को भी स्वीकारते हैं। किंतु यदि हम तात्विक अथवा तार्किक सत्य को ही मूल ज्ञान मान कर अध्यात्म का दमन कर दें, तब हमारा जीवन असंतोष और पीड़ा से भर जाता है। फिर तो हम बस यही सोच कर व्यथित होते हैं कि किस प्रकार हमारे दादा-परदादाओं ने एक मध्यम स्तरीय जीवन इतने सुख पूर्वक बिता लिया।

सार तो यही है कि हमें आस्था किसी ऐसी ही वस्तु या विचार में रखनी चाहिये जो कि अनंत, अमृत और सर्वव्यापी हो। भले ही क्षण भर हमें यह पता क्यों न हो कि वह बनावटी है, परमात्मा में भक्ति निरा श्रम-ही-श्रम है। यही भक्ति मोक्ष का मार्ग प्रकट करती है और इस जीवन के दुखों को भी सहनीय बना सकती है। यदि विज्ञान किसी दिन ऐसी भौतिक वस्तु का खोज कर ले तब तो हम उसे ही परमेश्वर मान लेंगे, किंतु जब तक ऐसा नहीं होता है तब तक हमें किसी व्यक्ति की परमात्मा में भक्ति की आलोचना नहीं करनी चाहिये। बल्कि हमें तो प्रयास करना चाहिये और भगवान से प्रार्थना करनी चाहिये कि जो भक्ति जीवन के लिये आवश्यक है, उसे हम बिना अनुराग के न करते रहें। सच्चिदानंद स्वरूप परमेश्वर हमें उनमें ही भक्ति के अनुराग की सन्मति दें।


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