"हम जगत्‌स्रष्टा परम पिता ब्रह्मा को नमस्कार करते हैं। हम सर्वेश्वर अधिदैव शिव जी को अपना सर्वस्व समर्पण करने की चेष्टा से नमस्कार करते हैं।"

आधुनिक युग में क्या इस वाक्य की कोई सार्थकता है? कथित वाक्य को आधुनिक मान्यता पर यदि पुनर्भाषित किया जाये तो हम सकते हैं कि “हम जीवन के स्रोत के खोज के लिये खुद को संलग्न करते हैं और वास्तविकता के परिचय के उद्देश्य से आत्म निरीक्षण करते हैं।“

यद्यपि कोई भी बुद्धिमान व्यक्ति इन दोनों वाक्यों के समन्वय को समझ सकता है, किंतु किसी कला अथवा साहित्य प्रेमी के लिये पूर्व वाक्य अर्थ प्रदान करता है और उत्तर वाक्य रूखा भाव प्रकट करता है। वहीं आधुनिक धर्म के अनुयायी बाद के वाक्य को ही वास्तविक और तथ्यात्मक बतायेंगे और पूर्व वाक्य को मिथक और रूढ़िवादी। तो क्या है जो ‘जगत्‌स्रष्टा’ को ‘स्रोत’ से या ‘नमस्कार’ को ‘निरीक्षण’ से या ‘समर्पण’ को ‘संलग्नता’ से पृथक करता है? अंततः दोनों ही विचार के लोग धर्म की धारणा रखते हैं।

हिंदुत्व का मूल

विचार और शब्द की शैली किस प्रकार जीवन और मानसिकता को प्रभावित करती है, इसी ज्ञान का नाम ‘वेद’ है। वेदों को हिंदू (सनातन धर्म) का मूल ग्रंथ कहा जाता है। वे मंत्रों का एक ऐसा संकलन हैं जिनके पाठ से पाठक ज्ञान, तृप्ति तथा मोक्ष की प्राप्ति कर सकते हैं। ‘वेद’ का अर्थ ‘आत्म ज्ञान’ होता है। पौराणिक संतों एवं ऋषियों तथा मुनियों ने इन विसंगतियों की व्याख्या की है। उनका कहना है कि वेद पाठ से अचेतन मन में देवों की चेतना का प्रसार होता है और पाठक समस्त संसार के विज्ञान और तथ्यों से परिचित हो किसी भी प्रकार के यज्ञ का निर्वाह कर सकता है।

वेदों के अतिरिक्त सनातन परम्परा में उपनिषद, पुराण इत्यादि कई शास्त्र हैं। उपनिषद वेदांत रूपी वेदों की व्याख्या करते हैं। पुराण जगत की सृष्टि के आदि काल से आधुनिक काल तक की घटनाएं जैसे भगवान के अवतार, विज्ञान, राजनीति, दर्शन, समाजशास्त्र इत्यादि का उल्लेख करते हैं। यदि हम सनातन परम्परा के सारे ग्रंथ एकत्रित कर लें तो हमें संसार के समस्त विषयों का एक सम्पूर्ण पाठ्यक्रम मिल जायेगा।

आधुनिक धर्म की परिभाषा से हिंदुत्व का उल्लेख

बहुत लम्बे समय तक हिंदू धर्म विश्व का एक मात्र धर्म था। उस समय धर्म की परिभाषा कुछ और थी। आज जब हम ‘धर्म’ शब्द का प्रयोग करते हैं तो उसका अर्थ समाज की रीति, नीति और भक्ति से लगाते हैं। किंतु हिंदू धर्म अपने काल में धारणा मात्र ही न था बल्कि एक मात्र ज्ञान का स्रोत था। यदि आज हम आधुनिक भौतिकी विज्ञान, जीव विज्ञान व रसायन शास्त्र के शोध पत्रों और दर्शन तथा राष्ट्रों के संविधान को समूहित कर कहें कि यही आधुनिक धर्म है तो क्या यह हास्यप्रद नहीं होगा? किंतु तथ्य तो यही है कि हिंदुत्व की आधुनिक धारणा इसी बात का साक्षात्कार है। कारण यह है कि सनातन शास्त्र इतने पुराने हैं कि उनका वर्गीकरण करते समय सबसे सुलभ तरीका हमें उनके पौराणिक समय से ही मिलता है। परिणाम स्वरूप हम हिंदुत्व को ज्ञान-विज्ञान के शास्त्र मानने के विपरीत पंथ-धारणा मात्र तक सीमित कर देते हैं और मिथ्या शास्त्री, मानव शास्त्री, इतिहासकार व आधुनिक धर्म शास्त्रियों के शोध का विषय बना कर उसका अपमान स्वरूप सीमांकन कर देते हैं।

विश्व के पृथक धर्मों का उदय

काल परिवर्तन हेतु संस्कृत और हिंदी विश्व स्तर पर लुप्त हो गयी। सनातन शास्त्रों की व्याख्या कठिन हुई और भाषांतरण अनुचित हुआ। विश्व स्तर पर कई घातक कठिनाइयां प्रत्युदित हुईं। मनुष्य जीवन मात्र के लिये संघर्ष करने लगा और साहित्य तथा विज्ञान का अर्थ लोप हो गया। प्रगति और शांति की पुनर्स्थापना के पश्चात हिंदुत्व एक बार फिर विश्व में प्रकाशित हुआ किंतु पाश्चात्य जगत की भाषा भिन्न होने के कारण और भारत में भी प्राचीन संस्कृत के पण्डितों के अभाव के कारण हिंदू शास्त्रों के शब्दों को दर्शन मात्र ही समझा गया। आधुनिक विज्ञान जगत के शास्त्रियों ने अपनी अलग भाषा बना ली और अन्ततः धर्म को विज्ञान और विज्ञान को राजनीति व समाज शास्त्र से पृथक कर दिया गया।

आज यह सिद्ध हो चुका है कि एशिया और यूरोप की कई भाषाएं उनकी मूल भाषा जिसको हम ‘प्रोटो-ईंडो-यूरोपियन” भाषा कहते हैं, से आतीं हैं। अतः यह कल्पना करना कठिन न होगा की संस्कृति और दर्शन भी उसी प्रकार आये होंगे। वास्तव में यदि हम प्राचीन रोम, ग्रीस तथा मिस्र आदि की धर्म कथाएं सुनें तो वे हिंदू कथाओं से बहुत मिलती-जुलती हैं। नवीन पीढ़ियों ने ज्ञान जो संस्कृत में सुरक्षित था उसे न समझा और कथाओं के आधार पर ही अपने लिये एक नया नाम बनाने के उद्देश्य से सभी धर्मों को मिथक बताया और सब प्रकार के ज्ञान का श्रेय खुद को ही देते रहे। यद्यपि बाद में कुछ लोगों ने पुरातन ज्ञान का पर्दा हटाया जिससे आधुनिक उपलब्धियों के अद्वितीय होने पर प्रश्न उठा किंतु तब तक राजनीति और हठ ने समाज पर अपनी गिरोह कस ली थी।

कई यूनानी, रोमन और अरबी ग्रंथों के उदाहरण हैं, जिनमें हिंदू ज्ञान का सरोकार होता है। साहित्य की चोरी करने वालों में एक रुचिकर गुण देखा जा सकता है। वे वास्तविक ज्ञान का कोई आदर नहीं करते। अन्य संस्कृतियों के द्वारा चुराये हुए सनातन ज्ञान ने अपना मूल अर्थ खो दिया। फिर उसे दर्शन के माध्यम से प्रचार का हिस्सा बना कर समाज में फैलाया गया और इससे तो धर्म का बहुत अपयश बढ़ा। हाँ। मैं यह भी स्वीकार करता हूँ कि केवल विदेशी संस्कृतियाँ ही नहीं बल्कि उनके सहित भारत भी ज्ञान भ्रष्ट करने के मार्ग पर उद्यत था।

अब्राहमी धर्मों का उदय

अंतर्काल में कानून बताने वाले धर्मों का उदय हुआ। कई नए धर्म उपजे जिनके संस्थापकों ने धर्म संस्करणों की कोई उति भी देनी ठीक न समझी। समाज की अनपढ़ता का फ़ायदा उठा उन्होंने पुरातन धर्मों को कलंकित किया और नए अधिकारियों के प्रति विश्वास स्थापित किया। वह ऐसा समय था जब ज्ञान का आदर न था। सिद्धि की मर्यादा दूसरों की आलोचना के आधार पर परिभाषित होती थी। अर्थात इन धर्मों के अधिकारियों ने दूसरों की आलोचना को ही अपनी सिद्धि बतलायी न कि वास्तविक ज्ञान को। उन्होंने पुरातन धर्मों को लांछित कर समाज के नकारात्मकता में अपना स्थान बनाया और बिना किसी उति या स्पष्टीकरण के सीधे कानून से जनता का विश्वास लूटा। परिणाम स्वरूप शब्दों की मर्यादा अर्थ में न हो कर अलंकार की सुंदरता मात्र तक सीमित हो गयी।

हिंदू धर्म इस स्तर तक नहीं गिरा। इसलिए, सभी नए धर्मों ने सामूहिक रूप से हिंदू धर्म और इसकी शाखाओं पर हमला किया। उनमें से बहुत सी शाखाएं विलुप्त हो गईं। भारत, हिंदू धर्म का स्रोत होने के कारण बच गया, किंतु मिस्र, रोम, ग्रीस और अन्य संस्कृतियां मृत्यु को प्राप्त हुईं।

आधुनिक धर्म

इस समय यह बात विशेष कर कहनी आवश्यक हो जाती है कि आधुनिक धर्म के लोगों को इन धर्मों के बारे में आलोचक सोच रखने में संकोच होना चाहिये। यद्यपि ये धर्म पाखण्ड से ग्रसित थे, फिर भी ये लोगों के हृदय में भक्ति का संचार करने में सक्षम तो थे ही। इन धर्मों के दमन के पश्चात तो संस्कृति समाज में आयी वो तो सभ्यता के लिये लज्जित होने योग्य थी। आज की स्थिति को हम मात्र अराजकता की संज्ञा ही दे सकते हैं। कभी न तृप्त होने वाली महत्वाकांक्षा और भौतिकवाद के उदय से व्यक्ति को कोई भी धारणा रखने की स्वतंत्रता के नाम पर अकेला कर दिया गया। आज नास्तिकता के संचार से संस्कृति का रक्त व्यर्थ ही बहता है और लोगों को सभ्यता के मान पर एक जुट करने वाले सिद्धांत का हनन होता है। सामाजिक औपचारिकता को कटघरे में रख, आज स्वार्थी मान्यताओं के बोल-बाले से लोग संबंधों को तोड़ते-जोड़ते हैं। विचारों की अराजकता और महत्वाकांक्षा की आड़ में आज शोषण फलता-फूलता है। अकाम कर्म को व्यर्थ समझा जाता है और बलिदान व समझौते कमजोरी की श्रेणी में गिने जाते हैं। आज का समाज बेचैनी, घबराहट, चिंता, अधीरता, उदासीनता, असंतोष और छिछलापन से त्रस्त है और दुखद बात तो यह है कि इसका लांछन हम राज नेताओं या उद्योगपतियों पर भी नहीं थोप सकते। जहाँ उपभोक्तावाद और भौतिकवाद सारे विश्व को सम दृष्टि से ग्रसे हैं, वहीं धर्म और दर्शन पृथक हो हर व्यक्ति से उसके हृदय में थोड़े से स्थान के लिये भीख मांगता भटकता-फिरता है।

उद्देश्य

आधुनिक धर्म के नेताओं को आज एक दूसरे से संबंध बना एक दूसरे को श्रेय देना सीखना चाहिये। उन्हें आज एक जुट हो भौतिकवाद और उपभोक्तावाद जो मन, शरीर, पृथ्वी और प्रकृति को दूषित कर रहे हैं, उनका सामना कर उन्हें पराजित करने का प्रयत्न करना चाहिये। मेरा यह मानना है कि आज के अवसाद, जल-वायु प्रदूषण और अन्य विनाशकारी बुराइयों का शोधन धर्म और उसके साम्य व संतोषी दर्शन से ही हो सकता है न कि और अधिक प्रौद्योगिकी विज्ञान से।

मेरे इस विचार से सहमत होने या असहमत होने के लिये पहले तो हमें अपनी आंखें जो हमने मूंदीं हुईं है, खोलनी होंगी। हमें अपनी वास्तविक स्थिति देखनी चाहिये। हमें यह समझना चाहिये कि अहंकार की विलासिता के आधीन रह कर प्रौद्योगिकी के वरदान स्वरूप जो जगमगाती दुनिया और समृद्ध जीवन हमें आज प्राप्त है, वह केवल एक मिथ्या है। जिस दिन इस मिथ्या से हम जागेंगे, बहुत देर हो चुकी होगी और क्या जाने कदाचित उस दिन हमारे जीवन का अभिशाप ऐसा प्रकट हो कि मृत्यु भी हमें जीवन से आनंददायी लगने लग जाये। किंतु सर्व प्रथम हमें सत्य को स्वीकारने की हिम्मत होनी चाहिये। हमें स्वीकारना होगा कि हमारा जीवन आज नकली और एकाकी हो गया है और हम अपनी कुण्ठा में जीवन की वास्तविक लड़ाई से कतराते रहते हैं। जिस प्रकार आज सत्य के युद्ध से बच कर जो समय हम व्यर्थ कर रहे हैं, परिणाम तो यही होगा कि अंत में हम अपनी ही विलासिता के मलबे के नीचे हम खुद को दबा-कुचला पायेंगे।


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