ॐसभी धर्मों से हिंदू धर्म को अलग करने वाली बात यह है कि यह अपने अनुयायियों को स्वतंत्र बनाता है । अब्राहमिक धर्मों और यहां तक कि बौद्ध और जैन धर्म में भी अपने अनुयायियों से कानूनों, आज्ञाओं या विधाओं का पालन करने के लिये कहते हैं। ईसाई धर्म और यहूदी धर्म में आदेश (कमांडमेंट) हैं; इस्लाम में शरियत है; बौद्ध धर्म में अष्ट गुणी मार्ग है और जैन धर्म की पंच-धारणा हैं। लेकिन हिंदू धर्म जीवन के लिए कुंजी उपलब्ध कराने में विश्वास नहीं करता। यह इस प्रक्रिया को जटिल बनाता है, ताकि लोग लिप्त हो सकें, कुछ शोध कर सकें, और अपने लिए सही रास्ता ढूंढ सकें। जैसा कि मैंने पहले के ब्लॉगों में उल्लेख किया है, हिंदू धर्म कानूनों का धर्म नहीं बल्कि ज्ञान और विज्ञान का धर्म है । इसलिए, आइए हम यह चर्चा करते हैं कि किसी व्यक्ति की जीवनशैली के लिए कानूनों या दिशानिर्देशों के पहलुओं में हिंदू धर्म का क्या कहना है।

सनातन धर्म में सभी निष्कर्ष प्राकृतिक नियमों से प्राप्त होते हैं, ताकि हम ब्रह्मांड के साथ स्वयं को संरेखित कर जीवन के संघर्ष को सहज और दक्ष बना सकें। दैनिक गतिविधियों के लिए दिशा-निर्देश विकसित करने के बारे में, हिंदू धर्म विविधता के प्राकृतिक कानून से निष्कर्ष निकालता है। हम जानते है कि प्रकृति अपने स्थूल रूप में विविधता निर्धारित करती है और इसलिए हम मानते है कि जीवन शैली के नियम एक निर्धारित सेट के बजाय एक व्यक्ति-परक विकल्प होना चाहिए । लेकिन कुछ दिशानिर्देश किसी व्यक्ति को अपने लिए उपयुक्त रास्ता खोजने का सबसे अच्छा तरीका समझने में मदद कर सकते हैं। ये दिशा-निर्देश भी कुछ प्राकृतिक कानूनों पर ही आधारित हैं ।

प्रकृति के गुण

इन कानूनों में से सबसे बुनियादी प्रकृति के तीन बुनियादी गुण हैं। दुनिया के सभी लोग और उनके कार्य, सत्व, रजस, और तमस के तीन गुणों से निर्देशित होते हैं। इन गुणों से प्रभावित कर्म इस प्रकार है:

सत्व - जिज्ञासा; ज्ञान की खोज; सार्वभौमिक कानूनों का अध्ययन; निष्काम भाव से परमात्मा के प्रति भक्ति; तपस्या करना और अनुशासित जीवन जीना; भौतिकी, रसायन विज्ञान, जीव विज्ञान आदि विज्ञानों और साहित्य, संगीत, राजनीति, अर्थशास्त्र आदि जैसी कलाओं का अध्ययन; शिक्षण और उपदेश और इसी तरह के अन्य कार्यों के माध्यम से ज्ञान का प्रसार।

रजस - शासन; आम लोगों के लिए न्याय के कानून बनाना और लागू करना; सभ्यता के लिए विकास और प्रगति के भौतिक उद्देश्य के साथ विज्ञान और कलाओं का अध्ययन करना; विकास को बढ़ावा देना और अन्याय के खिलाफ युद्ध; धन जमा करना और आर्थिक स्थिरता और सुरक्षा प्रदान करना।

तमस - अवकाश; संतोष; प्रणाली में विश्वास; शक्ति के प्रति वफादारी; अनुशासन और तपस्या की अवहेलना; परिवर्तन और रचनात्मक प्रवृत्ति।

प्रत्येक व्यक्ति तीनों गुणों द्वारा निर्देशित होता है, जो किसी न किसी क्रिया में प्रेरणादायक होते हैं। कोई भी व्यक्ति इन गुणों में से किसी एक से भी गुण से मुक्त नहीं हो सकता है क्योंकि ये ही मूल हैं, और न केवल जीवन में हैं, बल्कि भौतिक शरीर में भी हैं, यानी वे आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी के पांच तत्वों से एकत्व रखते हैं। इसके अलावा, ये गुण हर समय संतुलित रूप से काम नहीं करते और इस प्रकार विविधता और किसी व्यक्ति की प्रकृति की विशिष्टता पैदा करते हैं। इनमें से किसी भी गुण की अधिकता किसी व्यक्ति के लिए अप्राकृतिक नहीं है, किंतु समाज के लिए नकारात्मक हो जाती है जिसके परिणामस्वरूप दूसरों को अशांत करके और सभ्यता के प्रति असहयोगी होने से पाप होता है।

उदाहरण के लिए, सत्व की अधिकता एक ऐसी सीमा तक जिज्ञासा को बढ़ा सकती है कि एक व्यक्ति परमेश्वर में विश्वास खो सकता है और अंततः नास्तिक बन जाता है। या व्यक्ति तपस्या और पवित्रता के प्रति आसक्त बन कर अन्य गुणों को बेकार मानने लगता है और इस प्रकार अन्य लोगों का अनादर कर सकता है। इसी तरह, रजस की अधिकता से व्यक्ति व्यर्थ महत्वाकांक्षा जो जन्म दे कर दुनिया को जीतने की कोशिश करता है, और अपना ही कानून लागू करके के विविधता को बर्बाद कर सकता है। इसके अलावा, एक व्यक्ति अहंकारी बन सकता है खुद को भगवान समझने की भूल कर सकता है, या स्वयं के लिए धन जमा करने में लालची बन सकता है और दूसरों के संकट से आँख मूंद सकता है। तमस की अधिकता से समाज के कार्यों में आलस्य और अयोगदान हो सकता है। इसके अलावा, तमस द्वारा संचालित व्यक्ति शक्ति और प्रणाली को महत्व दे कर सर्वोच्च परमेश्वर के प्रति वफादारी खो सकता है। अनुशासन और अत्यधिक रचनात्मकता के परिणामस्वरूप अराजकता हो सकती है और झूठी या काल्पनिक मान्यताओं और विचारों का प्रचार किया जा सकता है।

हिंदू धर्म के वर्णाश्रम

संभवतः इन गुणों पर एक ही जीवन की छोटी अवधि में नियंत्रण किया जाना बेहद मुश्किल है। इसलिए, एक सरल निरोधात्मक प्रणाली के लिए, हिंदू धर्म वर्णाश्रम का निर्माण करता है जिससे किसी गुण का प्रभुत्व होने से व्यक्ति उपयुक्त कार्य कर सकता है और विविधता में योगदान देकर उचित मदद कर सकता है।

ब्राह्मण - ये सत्व और अन्य दो गुणों को अच्छे संतुलन में रखने वाले होते हैं। इन्हें समाज के सबसे सम्मानित लोगों में होना चाहिए और शोध, शिक्षण और उपदेश देने के व्यवसायों में लिप्त होना चाहिए । इन्हें संपत्ति बनाए रखने या धन जमा करने में समय बर्बाद नहीं करना चाहिए, बल्कि समाज को उनके कल्याण का ध्यान रखना चाहिए ताकि वे बदले में समाज के लिए कल्याण के कार्यों में समय बिता सकें ।

क्षत्रिय - ये रजस के प्रभुत्व के साथ दूसरे स्थान पर सत्व और तीसरे पर निष्क्रियता के गुणों से प्रभावित होते हैं। इन्हें समाज का शासक होना चाहिए और शिक्षित होना चाहिए। इन्हें पूरे समाज का ध्यान रखते हुए उसे एक बड़े परिवार की तरह मानना चाहिये।

वैश्य - महत्वाकांक्षा और निष्क्रियता के गुणों पर समान रूप से इन लोगों का वर्चस्व होता है। इन्हें व्यापार और वाणिज्य के कार्यों में लिप्त होना चाहिए। क्षत्रिय वर्ग को इस वर्ण पर कड़ाई से नियंत्रित करना चाहिए कि उनका लालच, असमानता और पूर्वाग्रह पैदा न करे और इस तरह समाज को नुकसान न पहुंचाए। ब्राह्मणों को ज्ञान को इस वर्ग के लिये सीमित रखना चाहिए ताकि वे जोड़-तोड़, एकाधिकार, अति दोहन आदि की भयावह व्यवस्था विकसित न करें।

शूद्र - ये तमस के प्रभुत्व के साथ दूसरे स्थान पर रजस और तीसरे पर सत्व के गुणों से प्रभावित रहते हैं। इन्हें देशभक्त और वफादार व्यवस्था बनाकर समाज के लिए सेवा प्रदान करना चाहिए। उन्हें इंजीनियरिंग के क्षेत्रों में काम करना चाहिए और बुनियादी ढांचे का निर्माण करना चाहिए तथा व्यापार और वाणिज्य को सुविधाजनक बनाना चाहिए। ब्राह्मणों को विनाशकारी हथियारों और गैर-पर्यावरण अनुकूल प्रौद्योगिकी की इंजीनियरिंग को रोकने के लिए ज्ञान को इस वर्ग के लिये सीमित करना चाहिए । क्षत्रिय को अराजकता और राष्ट्र तोड़ने वाले विद्रोहों को रोकने के लिए इस वर्ग के लिये संसाधनों की उपलब्धता सीमित करनी चाहिए।

धर्म के पद तथा नियम

किसी व्यक्ति के लिए अंतिम लक्ष्य, गुणों को संतुलित करना है ताकि वह दक्षता से जीवन व्यतीत कर सके, भले ही कई जन्मो या पीढ़ियों का समय लग जाये। इसे प्राप्त करने के लिये नियमों के दो सेट से है । नियमों का पहला सेट किसी के कार्यों के उद्देश्य का वर्णन करता है। काम, अर्थ, धर्म और मोक्ष के इरादों से अपने कार्यों में संतुलन बनाकर हम अपने जीवन के लिए एक ऐसा नियम बनाने की कोशिश कर सकते हैं जो अच्छा करने और समाज के लिए बलिदान करने की सभी शर्तों को संतुष्ट करे और साथ ही जीवन के सुखों का आनंद लेते हुए कष्ट को दूर रखे।

नियमों का दूसरा सेट हमें उन पद्धतियों को सिखाता है जिनके साथ हम इस संतुलन को हासिल कर सकते हैं । वे तप, पवित्रता, दया, और सत्य की चार विधाएं हैं । इन्हें धर्म नामक गाय/बैल के चार पदों के नाम से भी जाना जाता है। हिंदू धर्म सत्य-युग (१,७२८,००० वर्ष), त्रेता-युग (१,२९६,००० वर्ष), द्वापर-युग (८६४,००० वर्ष) और कलि-युग (४३२,००० वर्ष) के रूप में समय चक्रों का वर्णन करता है। सत्ययुग में धर्म के चारों स्तंभ हैं, त्रेता के अंतिम तीन, द्वापर में अंतिम दो और कलि में एक ही स्तंभ जीवित रहता है। वर्तमान काल कलियुग का है और इसलिए मुख्य रूप से, दुनिया ने तप, पवित्रता और दया की विधाओं को खो दिया है। हम कम से कम सत्य को जीवित रखने और फिर आगे चल कर अन्य स्तंभों को विकसित करने का प्रयास कर सकते हैं। लेकिन झूठी मान्यताओं और प्रणालियों से सभ्यता अक्षम बनती है और उसे व्यक्तिगत और बुनियादी जरूरतों के लिए संघर्ष पड़ता है। इसी प्रकार, मद्य दया, आसक्ति पवित्रता और गर्व तप को नष्ट कर देता है।

सारांश

इसलिए, प्रकृति के निर्धारित हमारे पीठासीन गुण और वर्णाश्रम की सच्चाई को स्वीकार करके, हम अपनी ताकत और कमजोरियों का पता लगा सकते हैं । फिर, हम समाज के निर्माण में कुशलतापूर्वक योगदान दे सकते हैं और इस प्रकार एक उपयुक्त और संतोषजनक जीवन व्यतीत करने में सक्षम हो सकते हैं । अंत में, हम अपने जीवन को सिद्ध करने के लिए मद्य, आसक्ति और गर्व के स्वभावों से लड़ सकते हैं। इन सिद्धांतों के आधार पर, एक सच्चे हिंदू को जीवन के नियमों का फैसला करना चाहिए, और एक स्थिर समाज बनाने में मदद करनी चाहिये जो अच्छे लोगों और स्वस्थ वातावरण के सम्मत हो।


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